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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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चतुर्दशस्तरङ्गः ३४५ अस्य आमयिकः प्रयोगः पर्णाक्षारस्तु मधुना कणाचूर्णसमन्वितः । वह्निदीप्तिकरः कामं गुल्मप्लीहोदरापहः ॥ १०१ ॥ पलाशक्षारसलिलैर्गव्यमाज्यं विपाचितम् । शीलितं नाशयत्याशु रक्तगुल्मं सुदारुणम् ॥ १०२ ॥ कदलीक्षारसंयुक्तः पर्णाक्षारस्तु शीलितः । अश्मरीं नाशयत्याशु दारुणां मूत्रशर्कराम् ॥ १०३ ॥ किंशुकक्षारतोयेन घृतं गव्यं विपाचितम् । निहन्ति शुक्रदोषन्तु ग्रन्थिभूताभिधं द्रुतम् ॥ १०४ ॥ यवक्षाररजोयुक्तः क्षारः खलु पलाशजः । निषेवितो निहन्त्याशु प्लीहानमतिदारुणम् ॥ १०५ ॥ मयूरक्षारसंयुक्तः पर्णाक्षारस्तु शीलितः । अग्रमांसं सुकठिनीभूतं प्रशमयत्यलम् ॥ १०६ ॥ अग्रमांसं उदरोध्वर्भागमध्यवर्तिमांसवृद्धिरूपरोगविशेषम् ॥ १०१-१०६ ॥ भा.टी.—पलाशक्षार और पिप्पलीचूर्ण को मधु में मिलाकर सेवन करने से क्षुधावृद्धि होती है और गुल्म, प्लीहोदर शान्त होते हैं। पलाशक्षार के जल से गोघृत को स्नेहपाकविधि से सिद्ध करके नियमपूर्वक सेवन करने से स्त्री का रक्त- गुल्म नष्ट हो जाता है। ढाक के क्षार में कदली (केला) क्षार मिला कर उचित अनुपान से सेवन करने पर अश्मरी (पथरी) तथा भयंकर मूत्रशर्करा नष्ट हो जाती है। पलाशक्षार के जल से गोघृत को स्नेहपाकविधि के अनुसार सिद्ध करके सेवन करने से शुक्र धातु की सब विकृतियाँ विशेषतः उसका ग्रन्थि- दोष (सुश्रुतोक्त) दूर हो जाता है। पलाशक्षार और जवाखार को मिला कर कुमारीस्वरस से कुछ काल सेवन करने से अत्यन्त बढ़ी हुई प्लीहा भी शीघ्र शांत हो जाती है। पलाशक्षार को अपामार्गक्षार से मिलाकर सेवन करने से शरीर में किसी स्थान पर बढ़े हुए कठिन मांस (अग्रमांस) में आराम आता है ॥ १०१-१०६ ॥ अथ चिञ्चाक्षारस्य नामानि चिञ्चाक्षारोऽम्लिकाक्षारश्चिञ्चिकाक्षारकस्तथा । आम्लीकाक्षारकश्चैव चिञ्चाभूतिश्च कथ्यते ॥ १०७ ॥