रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्दशस्तरङ्गः २४६ नारिकेललवणनिर्माणप्रकारः—ससलिलमिति शुष्कफलपरिहाराय । जटां उपरितनशुष्कप्रायतृणौघद्वयम् । रौद्रयन्त्रे आतपे इत्यर्थः कपालं नारिकेलमजोपरि कठिनकाष्ठरूपमावरणम् ॥ १२३-१२७ ॥ भा.टी.—एक सुपरिपक्व जलयुक्त नारियल को लेकर उसकी बाहरी जटाओं को चाकू से साफ करलें । अब इस कच्चे दूधिया गोले को जहाँ पर आंख सी बनी हुई होती है उस स्थान पर छेद करके भीतर का सारा जल निकाल दें और उसी छेद से गोले के भीतर दस तोला सैन्धानमक का सूक्ष्मचूर्ण भरदें और छेद को बन्द करके गोले के चारों तरफ अच्छी तरह कपड़मिट्टी कर धूप में सुखा लें । अच्छी तरह सूखने पर इस गोले को महापुट में रख कर फूँक दें । पुट के शान्त होने पर स्वांगशीत उक्त गोले को सावधानी से बाहर निकाल लें । इसमें से नारियल के बाहरी कठिन भाग की काली और कठिन भस्म को छोड़ कर भीतरी काले वर्ण के लवण को लेलें । इसी को नारिकेललवण कहा जाता है ॥ १२३-१२७ ॥ अस्य गुणाः लवणो नारिकेली यः पाचनः पित्तनाशनः, अम्लपित्तहरः कामं पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १२८ ॥ वातजं पित्तजं शूलं श्लेष्मजं सन्निपातजम् । शूलञ्च परिणामोत्थं नाशयेद्विकल्पतः ॥ १२६॥ मारुतकोपात् पित्ताशये पित्तशोषस्तस्माज्जातं शूलमपनयतीति विशेषः । पित्तशोषलक्षणं यथा—"पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोपं तदुच्यते” ॥ १२८, १२६ ॥ भा.टी.—नारिकेललवण पाचक और पित्तशामक होता है । यह अम्ल- पित्त को दूर करने तथा पित्तशोषजन्य शूल को शान्त करने के लिये सर्वोत्तम औषधि है । इसके अतिरिक्त नारिकेललवण वातिक, पैत्तिक, श्लेष्मिक तथा सन्निपातिक शूल और परिणामशूल को भी निःसंदेह नष्ट करता है ॥१२८, १२६॥ वक्तव्य—वायुप्रकोप से जब पित्ताशय में शोप हो जाता है अर्थात् पित्ता- शय में पहिले शोथ होकर उसका मुख बन्द हो जाने से पित्त प्रणाली में पित्त जमकर पथरी का रूप धारण कर लेता है तो इसके कारण पित्ताशय में तीव्र शूल होने लगती है । इसी को "पित्ताशयगतं पित्तं शुष्कं मारुतकोषतः । कुर्यात् शूलादिकं घोरं पित्तशोथं तदुच्यते ॥” लिखा है ।