रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context३५० रसतरङ्गिणी अस्य आमयिकः प्रयोगः लवणो नारिकेलाख्यो माषकद्वयसंमितः । नृसारयवजोपेतः पित्तशोषजशूलनुत् ॥ १३० ॥ भा.टी.—दो मासे नारिकेललवण को समभाग नौसादर और जवाखार चूर्ण में मिला जल अनुपान से देने पर पित्तशोषजन्य शूल में आराम आता है ॥ १३० ॥ अर्कलवणम् सुचूर्णितं सैन्धवन्तु समार्कदलसंयुतम् । अन्तर्धूमं पचेद्धीमान् स्वाङ्गशीतमथोद्धरेत् ॥ १३१ ॥ जायते खल्वसम्पिष्टं लवणं कज्जलप्रभम् । आयुर्वेदाचार्यवयैर्नाम्नार्क लवणं मतम् ॥१३२॥ अर्कलवणम्—समार्कदलसंयुतं तुलायां लवणसमानार्कपत्रसंयुक्तम् ॥१३१,१३२॥ भा.टी.—सैन्धानमक को अच्छी तरह पीसकर चूर्ण कर लें, फिर उसमें समभाग आक के पत्ते मिलाकर एक हांड़ी में भर कर उसका मुख किसी सकोरे से अच्छी तरह बन्द करके गजपुट में फूंक दें जिससे वह सम्पुट अन्तर्धूम अच्छी तरह पक जाय । स्वांगशीत होने पर सम्पुट को निकाल उसमें कुछ काले से वर्ण के लवण को निकाल खरल से पीसकर रख लें । इस विधि से बनाये हुए लवण को आयुर्वेद के आचार्य लोग अर्कलवण के नाम से व्यवहार में लाते हैं ॥ १३१, १३२ ॥ अस्य गुणाः यकृत्प्लीहोदरहरं रुचिरं मलभेदनम् । विशेषतः समाख्यातं तन्त्रेऽर्कलवणं बुधैः ॥१३३॥ भा.टी.—अर्कलवण के प्रयोग से यकृत् तथा प्लीहोदर रोग दूर होता है। अन्न में रुचि पैदा होती है। कुछ दिन निरन्तर सेवन करने से मल पतला होकर आता है और कब्ज नहीं रहता है ॥ १३३ ॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः माषकार्द्धमितं त्वर्कलवणं कोष्णवारिणा । पथ्याशिभिस्तु पुरुषैः सततं परिशीलितम् ॥ १३४ ॥ वातिकं श्लैष्मिकं वापि सज्ज्वरं वापि विज्वरम् । सकोष्ठबद्धं व्यथया चीत्कारयुतयापि वा ॥ १३५ ॥