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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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३६० रसतरङ्गिणी से तत्काल शरीर गौरव तथा अजीर्ण नष्ट होकर पुनः तीव्र क्षुधा मालूम होने लगती है । और यदि आमाशय में लवणाम्ल की अधिकता होने के कारण रोगी को अजीर्ण हो तो उसे भोजन के पूर्व लवणाम्ल को जल में मिलाकर सेवन कराना चाहिये । क्षार प्रमेह में जब मूत्र में क्षारीय तत्त्व अधिक मात्रा में निकलते हों तो लवणद्राव के प्रयोग से इनका निकलना बन्द हो जाता है । आन्त्रिकज्वर ( Typhoid Fever ) में जब रोगी की जिह्वा सूख जाय, स्वर मन्द हो जाय, साधारण प्रलाप और हृदय में दुर्बलता के साथ उसकी नाड़ी की गति कभी स्पष्ट और तीव्र हो और मूत्र में मल आता हो तो इसके प्रयोग से आराम आता है । अफीम सेवन करने से होनेवाली हृदय की दुर्बलता में कुछ दिन तक निरन्तर लवणद्राव का सेवन करने से उक्त हृदयदौर्बल्य मिट जाता है । सजललवणाम्ल को पर्याप्त जल में मिलाकर सेवन करने से अरुचि और अग्निमान्द्य में अवश्य आराम मिलता ॥ १७६-१८४ ॥ यह क्षारविशेषादिविज्ञानीय नाम चतुर्दशतरङ्ग समाप्त हुआ । अथ सुवर्णविज्ञानीयः पञ्चदशतरङ्गः धातुपदस्य निर्वचनम् खालित्यमथ पालित्यं कार्श्यं वार्द्धक्यमेव च । अपनीय दधत्येते देहं तद्धातवः स्मृताः ॥ १ ॥ धातुपदसामान्यनिर्वचनं स्वर्णादीनामौषधप्रयोगयोग्यतासूचनाय । देहधार- कत्वमेव हि धातूनां धातुत्वम् इति ॥ १ ॥ भा.टी.—स्वर्ण, रजत आदि द्रव्यों को धातु शब्द से व्यवहार में लाने का कारण यह है कि इनके प्रयोग से अकाल में होनेवाले खालित्य ( बालों का उड़ना ) पालित्य ( अकाल में ही बालों का सफेद होना ), कृशता (शरीर का सूखना ) तथा बुढ़ापा आदि लक्षण अथवा रोग दूर होकर शरीर दृढ़ और कार्यक्षम (धारण-समर्थ) होता है । अतः इनको धातुशब्द से कहा जाता है॥१॥ वक्तव्य—उक्त धातुनिर्वचन के अतिरिक्त धातुपरीक्षण में तीन मुख्य विशेष- तायें देखी जाती हैं जिससे धातु और अधातु के बीच भेद किया जाता है । १—कोई भी खनिजद्रव्य ( धातु ) आभा और प्रभाववाला होता है । २—धातु न्यूनाधिक रूप में विद्युत् धारा को वहन करनेवाले होते हैं । ३—बिना