BharatKosha
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 411 of 799

Read in context
Page 411

२५ षोडशस्तरङ्गः ३८५ मानसिक दौर्बल्यजन्य व्याधियों में स्वर्णभस्म को ब्राह्मीरस, वचाचूर्ण या शतावरीस्वरस, अथवा जटामांसी कषाय के साथ सेवन कराने से शीघ्र लाभ होता है । शरीर में अकाल में उत्पन्न जराप्रभाव को दूर करने के लिये स्वर्ण- भस्म को च्यवनप्राश तथा मकरध्वज और अभ्रकभस्म के साथ सेवन करना चाहिये । शरीर में किसी प्रकार के प्रविष्ट विषप्रभाव को नष्ट करने के लिये प्रथम रोगी को वमन, विरेचन देकर स्वर्णभस्म या स्वर्णपत्रों को तब तक मधु अथवा आमलकी या निर्विषीचूर्ण या कषाय के साथ देते रहना चाहिये जब तक कि विषलक्षण शान्त न हो जाय । स्वर्णविज्ञानीय नाम पञ्चदश तरंग समाप्त हुआ । —:०:— अथ रजतविज्ञानीयः षोडशस्तरङ्गः । रजतस्य नामानि रजतं रुचिरं रौप्यं तारं सौधञ्च शुभ्रकम् । चन्द्रलोहं चन्द्रहासं रूपकं चन्द्रसंज्ञकम् ॥ १ ॥ रजतानामानि व्यवहार्याणि तन्त्रे । चन्द्रसंज्ञकं यावच्चन्द्रनामपर्यायम् ॥१॥ भा.टी.—रजत, रुचिर, रौप्य, तार, सौध, शुभ्रक, चन्द्रलोह, चन्द्रहास, रूपक तथा चन्द्रमा के सब नाम चांदी के नाम कहे जाते हैं ॥ १ ॥ ग्राह्यरजतस्य स्वरूपम् छेदे निकषफलके दहने प्रकामं रम्यञ्च शारदकलाधरमण्डलाभम् । नाराचिकाधृतमलं गुरुतामुपेयात् । स्निग्धं तदेव कथितं रजतन्तु जात्यम् ॥२॥ जात्यं उक्तञ्च प्राचीनैः—“गुरु स्निग्धं मृदु श्वेतं दाहच्छेदघनक्षमम् । वर्णाढ्यं चन्द्रवत्स्वच्छं रूप्यं नवगुणं शुभम् ॥” इति । प्रकारान्तरेण जात्यरज- तनिरूपणं व्याख्यावैशद्यार्थम् ॥ २ ॥ भा.टी.—जो चांदी छेनी से काटने पर, कसौटी में घिसने पर अथवा अग्नि में तपाने पर सुन्दर स्वच्छ, शरत्कालीन चन्द्रमण्डल के समान श्वेतवर्ण की हो और तौल में भी पर्याप्त भारी हो, बाहर से देखने में चमकीली चिकनी हो उसे जात्य ( उत्तम ) चाँदी कहते हैं ॥ २ ॥