रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context३८६ रसतङ्गरिणी वक्तव्य—प्राचीन ग्रन्थों में लिखे हुए रजत के भेदों को यहाँ पर नहीं लिखा गया है, क्योंकि ग्राह्यरजत के लक्षण जिस में मिलें उसे औषधिप्रयोगार्थ उत्तम समझना ही यहाँ पर उद्देश्य है। ग्रन्थान्तर में रजत के तीन भेद पाये जाते हैं १—सहज, २—खनिज, ३—कृत्रिम । इनमें सहज रजत वह कहा जाता है जो कैलास आदि बहुत ऊँचे दूरवर्ती पर्वतों से पाया जाता है। खनिज वह होता है जो हिमालयादि पर्वतों के शिखरों में होनेवाली खानों से प्राप्त किया जाता है। कृत्रिम वह है जो रजत वंग योग से बनाया जाता है। खनिज को खनिज ही गिनकर रजत के खनिज और कृत्रिम दो भेद मानते हैं। कई ग्रन्थकार सहज और कई वैद्य शुक्ल और कृष्ण वर्णभेद से रजत के दो भेद मानते हैं। लोक व्यवहार में भी प्रायः ईंट की चाँदी और कलदार चाँदी दो मुख्य भेद माने जाते हैं। कलदार चाँदी में ताम्र आदि धातुओं का मिश्रण होने से वह कठिन और कृष्णवर्ण की होती है। इसी तरह यूनानी वैद्यक में भी इसके सात भेद माने गये हैं। परन्तु वे सब खनिज और कृत्रिम रजत के अन्तर्गत ही समझने चाहिये। त्याज्यरजतस्य स्वरूपम् दाहेऽतिमलिनं पीतं रक्तं रूक्षं लघु स्फुटम् । कठिनं सदलञ्चैत्र रजतं त्याज्यमुच्यते ॥ ३ ॥ भा.टी.—अग्नि में तपाने पर अत्यन्त मलिन होनेवाला, पीतरक्तवर्ण मिश्रित, बाहर से देखने में खुश्क, लघुभार, हथौड़े की चोट से फटनेवाला, कठिन और पत्रयुक्त रजत त्याज्य समझना चाहिये ॥ ३ ॥ प्रकारान्तरेण जात्यरजतस्य स्वरूपम् निर्मलं पिच्छिलं स्निग्धं मृदुलं निर्दलं घनम् । शरदिन्दुनिभं यच्च रजतं जात्यमुच्यते ॥ ४ ॥ भा.टी.—जात्य रजत स्वच्छ, पिच्छिल, चिकना, मृदु, दलरहित और शरदकालिक चन्द्रमा की तरह उत्तम चाँदी होता है। रजतशोधनस्य प्रयोजनम् तारं विवर्द्धयति सर्गजगात्रतापं वीर्यं विनाशयति हन्ति शरीरपुष्टिम् । विड्र्बन्धनं रचयतीह तथाङ्गसादं ईषन्मृतं त्वपि मृतं यदि शुद्धिहीनम् ॥ ५ ॥