रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६५० रसतरङ्गिणी तत्र वत्सनाभक्षुपस्य परिचयः शिष्यमतिवैशद्यार्थः। अस्य पत्राणि सिन्दुवा- रपत्रतुल्यानि परं पञ्चाङ्गुलवत् अस्योपरितनभागश्छिन्नमिव भवति ॥१०, ११॥ भा.टी.-वत्सनाभ पौधे के पत्ते सम्भालू के पत्तों से मिलते-जुलते होते हैं। और पाँच-पाँच के ग्रूप ( झुण्ड ) में जुड़े होते हैं । इसके आस-पास के वृक्ष बढ़ने नहीं पाते हैं। इसके पुष्प नीले रंग के निकलते हैं। इसके क्षुप की ऊँचाई दो हाथ के करीब होती है। वह कन्द जातीय क्षुप होता है। इसी के कन्द को रसशास्त्रज्ञ "वत्सनाभ" शब्द से कहा करते हैं। यह क्षुप प्रायः गढ़- वाल, काश्मीर तथा नेपाल आदि पाँच हजार से अधिक ऊँचाईवाले शीत पर्वतीय प्रान्तों में पाया जाता है ॥ १०, ११ ॥ वत्सनाभस्य परिचयः दैर्घ्ये तु पञ्चाङ्गुलतः परं सप्ताङ्गुलोन्मितः । व्यासे चैकाङ्गुलात् सार्द्धद्वयङ्गुलप्रमितस्तथा ॥ १२ ॥ आमूलचूलं क्रमशः स्थूलश्च पाण्डुरप्रभः । कन्दोऽस्य भिषजां वयैर्वत्सनाभ इति स्मृतः ॥१३॥ दीर्घमूलं स्थूलकन्दं वत्सनाभविषक्षुपम् । उत्पाट्य शीतसमये वसन्ते वा समाहरेत् ॥१४॥ शीतसमये वसन्ते वा समाहरणं पूर्णवीर्य्यत्वात्तदानीमस्येति भावः॥१२-१४॥ भा.टी.-वत्सनाभ-कन्द प्रायः पाँच अंगुल से लेकर सात अंगुल तक लम्बा होता है। इसकी मोटाई या व्यास एक अंगुल से लेकर ढाई अंगुल तक होती है। यह मूल की तरफ से शिखा की तरफ मोटा होता है और वर्ण में पांडुर अर्थात् पीत श्वेत वर्ण मिश्रित होता है। इसी कन्द को वैद्य लोग वत्स- नाभ ( बछड़े की नाभि के आकार का होने से ) कहते हैं। क्योंकि इसके कन्द में शीतऋतु अथवा वसन्त ऋतु में पूर्ण वीर्य-शक्ति प्राप्त हो जाती है, अतः लम्बी मूलवाले स्थूल ( मोटा ) कन्द वत्सनाभ क्षुप को उखाड़ कर वसन्त या शीत ऋतु में वत्सनाभ विष का सञ्चय करना चाहिए ॥ १२-१४ ॥ वत्सनाभस्य भेदाः कृष्णाभः कपिशः पाण्डुर्वर्णातस्त्रिविधो मतः । वत्सनाभो विशेषेण क्रमेण गुणवत्तमः ॥१५॥ कृष्णाभ इति तस्य त्रैविध्यम् । कृष्णापेक्षया कपिशः कपिशापेक्षया च पाण्डुरो गुणवान् इति ॥१५॥