रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
Page 676 of 799
Read in contextचतुर्विंशस्तरङ्गः ६५१ भा.टी.-वत्सनाभ का कन्द वर्ण ( रंग ) भेद से तीन प्रकार का पाया जाता है । १-कृष्णाभ ( कुछ काले रंग का ), २-कपिश ( पीला सफेद भूरे रंग का ), ३-पाण्डु ( पीला सफेद ) । इनमें से कृष्णवर्ण वत्सनाभ की अपेक्षा कंपिश और कपिश की अपेक्षा पाण्डुर वर्ण वत्सनाभ गुणों में उत्तम माना जाता है ॥१५॥ वत्सनाभस्य नामानि वत्सनाभो वत्सनागः दवेडोऽङ्गी च विषं मतम् । अमृतञ्च तदेवोक्तं रसतन्त्रविशारदैः ॥१६॥ रसशास्त्रज्ञ लोग, वत्सनाभ विष को वत्सनाभ, वत्सनाग, दवेड, विष तथा अमृत शब्द से व्यवहार करते हैं ॥ १६ ॥ ग्राह्यवत्सनाभस्य स्वरूपम् स्थूलं स्निग्धं गुरु नवं फलपाकोत्तरोद्धृतम् । कीटाद्यभक्षितञ्चैव विषं ग्राह्यमिहोच्यते ॥१७॥ भा.टी.-औषधिकार्य में लिया जानेवाला वत्सनाभ कन्द मोटा, बाहर से चिकना स्पर्श, गुरुभार, नवीन और फलों ( वत्सनाभ फल ) के जाने के बाद उखाड़ा हुआ तथा घुन आदि लगने से रहित होना चाहिए ॥१७॥ वत्सनाभसंशोधनस्य प्रयोजनम् अविशुद्धं विषं दाहं मोहं हृद्गतिरोधनम् । मृत्युञ्च विदधात्याशु तस्मात्तं परिशोधयेत् ॥१८॥ भा.टी.-बिना शुद्ध किया हुआ वत्सनाभ विष सेवन करने या कराने से शरीर में दाह, मूर्च्छा तथा हृदयगति का अवरोध करता है, जिससे कई बार इसके अशुद्ध और अधिक प्रयोग से शीघ्र ही मनुष्य की मृत्यु हो जाया करती है । अतः इन दोषों या विकारों को दूर करने के लिए इसको सदा शुद्ध करके प्रयोग करना चाहिए ॥१८॥ वत्सनाभस्य प्रथमः शोधनप्रकारः यथोक्तगुणसंपन्नं वत्सनाभं समाहरेत् । ततश्चणकसंस्थानं खण्डशः कारयेद्भिषक् ॥१६॥ पाषाणचषके वापि मृत्तिकाभाजने ततः । गोमूत्रेण समाप्लाव्य स्थापयेत्प्रखरातपे ॥२०॥ प्रत्यहं पूर्वनिक्षिप्तं गोमूत्रमपनीय तु । दत्त्वा च नूतनं मूत्रं तीव्रघर्मे तु विन्यसेत् ॥२१॥