रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६५२ रसतरङ्गिणी एवं दिनत्रयं कृत्वा त्वचामपनयेत्ततः । शोषयेच्च विषं त्वेवं शुद्धिमायात्यनुत्तमाम् ॥२२॥ यथोक्तगुणसम्पन्नमिति प्रथमः शोधनप्रकारः । यथोक्ता गुणाः स्थूलस्निग्ध- त्वादयः । संस्थानं आकृतिम् ॥१६-२२॥ भा.टी.-उक्त गुण (स्थूल, नव, पूर्ण रस वीर्य ) सम्पन्नवत्सनाभ विष को लेकर उसको चने के बराबर छोटे-छोटे टुकड़े कर लें । अब इन वत्सनाभ के टुकड़ों को किसी पत्थर के पात्र अथवा मिट्टी के पात्र में डालकर उसमें ताजा गोमूत्र भर दें और पात्र को तेज धूप में रख दें । प्रतिदिन प्रातःकाल पुराना पहिले का गोमूत्र निकालकर फिर उसी समय इस पात्र में नया गोमूत्र भरकर धूप में रख दें । इस प्रकार तीन दिन नया मूत्र डाल धूप में रखने के बाद इसको गोमूत्र से बाहर अलग निकालकर इसकी बाहरी त्वचा को धीरे-धीरे किसी चाकू आदि से छिल कर अलग कर दें और भीतर के शुद्ध विष को धूप में रख- कर सुखा लें । इस विधि से वत्सनाभ विष उत्तमरूप से शुद्ध हो जाता है ॥१६-२२॥ द्वितीयः शोधनप्रकारः विषं चणकसंस्थानं कृत्वा पोट्टलिकागतम् । सुरभीपयसा चेह दोलिकायन्त्रयोगतः ॥२३॥ यामद्वयं वा यामैकं स्वेदयेदतियत्नतः । संशोधितं विषं त्वेवं विशुद्ध्यति न संशयः ॥२४॥ गोदुग्धेन अजादुग्धेन वा दोलाया यामं स्वेदनादपि शुद्धयति ॥२३, २४॥ भा.टी.-वत्सनाभ विष को चने के बराबर टुकड़े करके एक स्वच्छ कपड़े में बाँधकर इसको पोटली बना लें । अब इस पोटली को दोलायन्त्र में गाय का दूध भरकर उसमें लटका दें और दोलायन्त्र को चूल्हे पर रखकर तीन अथवा छः घंटे तक पकायें इस विधि से भी वत्सनाभ की शुद्धि हो जाती है ॥२३, २४॥ वक्तव्य-दोलायन्त्र में गोदुग्ध से स्वेदन करने के बाद विष को गरम जल से धोकर सुखा लेना चाहिए । तृतीयः शोधनप्रकारः खण्डीकृतो वत्सनाभः पोट्टलीगर्भसंस्थितः । अजादुग्धेन सुस्विन्नो यामतः शुद्धिमाप्नुयात् ॥२५॥ भा.टी.--वत्सनाभविष के छोटे-छोटे टुकड़े करके उनको एक कपड़े की