रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्विंशस्तरङ्गः ६५३ पोटली में बाँधकर बकरी के दूध के द्वारा दोलायन्त्र में तीन घण्टे तक स्वेदन करने से भी वह शुद्ध हो जाता है ॥ २५ ॥ अथ वत्सनाभस्य गुणाः विषं तु कटुकं तिक्तमुष्णं चैव कषायकम् । योगवाहि परं चेतन्महोत्कृष्टं रसायनम् ॥ २६ ॥ त्रिदोषघ्नं विशेषेण मतं वातबलासनुत् । दीपनं शीतशमनं बृंहणं बलवर्द्धनम् ॥ २७ ॥ अग्निमान्द्यप्रशमनं प्लीहोदरनिबर्हणम् । वातरक्तापहं चैव श्वासकासविधूननम् ॥ २८ ॥ गुदामयग्रहणिाकागुल्मनिर्दलनं परम् । कुष्ठपाण्डुज्वरहरं त्वामवातप्रणाशनम् ॥ २६ ॥ विनिहन्ति विशेषेण तिमिरं च निशान्धताम् । अभिष्यन्दं नेत्रशोथं कर्णशोथञ्च दारुणम् ॥ ३० ॥ कर्णशूलं शिरःशूलं गृध्रसीं कटिवेदनाम् । आखुवृश्चिकसर्पाणां विषं चैवाविलम्बितम् ॥ ३१ ॥ विषन्तु कटुकमिति वत्सनाभस्य गुणाः । बृंहणं शरीरधातुवृद्धिकरम् । गुदामयाः अर्शांसि ॥ २६–३१ ॥ भा.टी—वत्सनाभ कटु तिक्त और कषायरस उष्ण गुण और उत्तम योग- वाही धर्मवाला होता है । यह विधिपूर्वक सेवन करने से श्रेष्ठ रसायन गुण करता है । यह अन्त:प्रयोग में त्रिदोष ( पित्त तथा कफ ) नाशक है, किन्तु विशेष रूप से वात और कफनाशक है । इसके सेवन से अग्नि वृद्धि होती है और शीत-प्रभाव शान्त हो जाता है । शरीर में पुष्टिके साथ बल की वृद्धि होती है । इसके सेवन से अग्निमान्द्यरोग, प्लीहोदररोग, वातरक्तरोग तथा श्वास और कास रोग नष्ट होते हैं । इसको बवासीर, संग्रहणी और गुल्महर योगों में मिला- कर देने से उक्त व्याधियों को समूल नाश करता है। इसके सेवन से कुष्ठ (त्वचा के रोग), पाण्डु तथा ज्वर और आमवात रोगों में आराम आता है । इसके निरन्तर उपयोग से तिमिर तथा रात्र्यन्धता में विशेष रूप से आराम आता है । नेत्राभिष्यन्द, नेत्रशोथ, कर्णशोथ, कर्णशूल, गृध्रसी तथा कटिवेदना में इसका प्रयोग सुखजनक होता है । इसीतरह बाह्य प्रयोग में यह चूहा, बिच्छू तथा सर्प विषों को शीघ्र ही नष्ट कर देता है ॥ २६–३१ ॥