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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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४२ चतुर्विंशस्तरङ्गः ६५७

तक तीव्रज्वर आदि कारणों से बढ़ी हुई हृदय की गति (Pulpitation) को यह नियमित करता है । अन्य स्वेदजनक औषधियों की अपेक्षा (जो कि पसीना लाकर ज्वर को कम करती हैं) यह उत्तम ज्वरशामक है और अधिक मात्रा में पसीना भी नहीं लाता है। अति अधिक बढ़े हुए रक्तसञ्चार (Blood presure) को घटाने और नियमित करने में यह वत्सनाभ अचूक और सर्वोत्कृष्ट महौ- षधि है । रक्तभाराधिक्य को कम करने के लिये आजकल भारतवर्ष में अत्य- धिक रूप से रसचिकित्सा में विष का प्रयोग होने के कारण हीं रक्तनिर्हरण (फस्त खोलना) विरेचक रक्त के दबाव को कम करनेवाले उपचार प्रायः लुप्त-से हो गये हैं । अर्थात् एकमात्र वत्सनाभ प्रयोग से फस्त खोलने आदि उपचारों की आवश्यकता ही नहीं पड़ती है । क्योंकि शुद्ध वत्सनाभ मात्रापूर्वक सेवन करने पर कभी हृदय-गति को मन्द नहीं करता है और नहीं उसमें अनि- यमितता को उत्पन्न करता है। शुद्ध वत्सनाभ का प्रयोग मस्तिष्क में बढ़ी हुई रक्तसञ्चारण क्रिया तथा मस्तिष्क में होनेवाले रक्तसञ्चय को शीघ्र ही दूर कर देता है । शुद्ध वत्सनाभ अन्तःप्रयोग में फुप्फुसच्छदशोथ (Pleurisy) तथा फुप्फुसशोथ (Pneumonia) और शोथजन्य विविधप्रकार के ज्वरों को नष्ट करता है वत्सनाभ प्रयोग से हृदयावरणजन्यशोथ (Pericarditis) तथा अन्त्रावरण शोथजन्य ज्वर (Perilenitis) नष्ट हो जाते हैं । कई चिकित्सकों का मत है कि प्लुरिसी, निमोनिया आदि रोगों के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से इन रोगों की वृद्धि रुक जाती है । गले में होनेवाले गलशोथ, तुण्डिकेरी तथा गलशुण्डिका आदि अन्यान्य कंठरोगों में विष प्रयोग से शीघ्र आराम आता है । बाह्याभ्यन्तर शरीर के किसी स्थान से किसी अभि- घात आदि के कारण होनेवाले रक्तस्राव को रोकने में वत्सनाभ का प्रयोग किया जाता है । शुद्ध वत्सनाभ के प्रयोग से तीव्र शिरोवेदना, छींक, दाह तथा आँखों के दोनों भौंओं में दाह के साथ होनेवाले नूतन प्रतिश्याय में आराम आता है । कफयुक्त अधिक रक्त या अल्परक्त सहित अत्यधिक मल और वेग- युक्त प्रवाहिका के प्रारम्भ में वत्सनाभ का प्रयोग करने से रोग भयंकर रूप धारण नहीं कर सकता है और शान्त हो जाता है । जत्रु ऊर्ध्वगामी जो पञ्चमी नाड़ी (Fifth cranial Nerve or Trigeminal Nerves) है उसमें होनेवाले शूल को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र ही शांत कर देता है । तीव्रवेग या अल्पवेग अत्यधिक गाढ़े लाल रंग के ज्वर सहित ऊर्ध्वगत रक्तपित्त में वत्स- नाभ का प्रयोग शीघ्र लाभ पहुँचाता है। तापांश को कम करने के लिये वत्सनाभ