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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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६५८ रसतरङ्गिणी को तब तक हर तीसरे घण्टे बाद प्रयोग करना चाहिये जब तक कि शारीरिक ताप १०० डिग्री तक न आ जाय । १०० सौ डिग्री से कम ताप हो जाने पर विष का प्रयोग नहीं करना चाहिये । विभिन्न कारणों से उत्पन्न होनेवाले शीतपूर्व और दाहान्त अर्थात् प्रायः मलेरिया (जिसमें भीतर अधिक गर्मी मालूम पड़ती हो, नाड़ी बहुत तेज चलती हो, अत्यधिक प्यास और हृदय की गति बहुत तेज हो, पेट में अफारा और अजीर्ण हो, पसीना न आता हो और शारी- रिक तापांश बहुत बढ़ा हुआ अर्थात् १०५-१०७ डिग्री हो, रोगी कास, हस्त- पादकम्प और शिरःशूल से बहुत बेचैन हो और रोगी को किसी तरह शान्ति, चैन न आता हो और उसे बहुत घबड़ाहट और मृत्यु का डर हो, सारे शरीर में वातिक वेदनायें होती हों, मुखमण्डल लाल हो रहा हो, शारीरिक त्वचा खुश्क और गर्म हो और गाढे लाल रंग का मूत्र आ रहा हो) में तो वत्सनाभ को विधिपूर्वक सेवन कराने से शीघ्र ही सब लक्षण और उपद्रव शान्त हो जाते हैं । शरीर के विविध स्थानों में विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाले अनेक तरुण ( नूतन) शोथों में वत्सनाभ शीघ्र लाभ पहुँचाता है। विविध कारणों से उत्पन्न होनेवाली विभिन्न लक्षणोंवाली, स्पर्शासह, ( असहनीय ), रात्रि में होनेवाली शारीरिक वेदना को वत्सनाभ प्रयोग शीघ्र शान्त कर देता है। विष के गुणों के विषय में संक्षेप में यह समझना चाहिये कि शुद्ध वत्सनाभ को तत्तद् रोग- नाशक औषधियों के साथ मिला कर प्रयोग करने से यह योगवाहि धर्मके कारण सब प्रकार के भयंकर रोगों को नष्ट करता है। तत्तद् रोग नाशक प्रधान-प्रधान रसों के सेवन कराने से जो रोग नष्ट नहीं हो पाते हैं, वे रोग विधिपूर्वक विषके प्रयोग से शान्त हो जाते हैं ॥ ३२-६० ॥ वक्तव्य—वृद्धवाग्भट में विषसेवन के विषय में किन २ बातों पर विशेष ध्यान देना चाहिये, उनको इस प्रकार से लिखा है—"घृतोपस्कृतदेहस्य विशु- द्धस्य हिताशिनः। सात्त्विकस्योदिते भानौ योज्यं शीतवसन्तयोः॥ ग्रीष्मेप्यात्ययिके व्याधौ" तथा "अभ्यस्तेऽपि विषे यस्मात् वर्जनीयान् विवर्जयेत् । कट्वम्लतै- ललवणदिवास्वप्नातपानलान् ॥ रूक्षमन्नं विशेषेण भयं वाजीर्णतः सदा । दृग्विभ्रमं कर्णरुजामन्यांश्चानिलजान् गदान् । विषं रूक्षाशिनः कुर्यात् मृत्युमेव त्वजीर्णतः ॥" इत्यादि । बहिः प्रयोग में वत्सनाभ स्थानिक संज्ञावाहिनियों को आरम्भ में थोड़ा सा उत्तेजित कर फिर संज्ञा रहित कर देता है, जिससे उस स्थान में होनेवाली पीडा शान्त हो जाती है । यह पराश्रयी जीवाणुहर भी है। थोड़ी मात्रा में मुख द्वारा