रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६६० रसतरङ्गिणी भा.टी..—वैद्य को चाहिए कि वत्सनाभ विष को जहाँ तक हो सके प्रायः बालक, अत्यन्त वृद्ध, गर्भवती, रुग्णा, अतिक्षीण शरीर, राजयक्ष्मा के लक्षण युक्त अवस्था में, क्रोधित मनुष्य को और अतिभ्रान्त मनुष्य को हृदय की दुर्ब- लावस्था में ( विशेष रूप से ) वत्सनाभ का प्रयोग ( अन्तःप्रयोग ) न करें। यदि अल्पवयस्कों को बिना विषप्रयोग किये हुए कार्य नहीं चलता हो तो बड़ी सावधानी के साथ बहुत अल्प मात्रा में और बहुत थोड़े समय के लिये प्रयोग कर सकते हैं ॥६१-६३॥ विषस्य मात्रायां प्रयोगे फलवैशिष्ट्यम् विषं भवति पीयूषं मात्रया विनियोजितम् । तदेवामात्रया युक्तं द्रुतं मुष्णाति जीवितम् ॥६४॥ तस्मात्पूर्वन्तु रोगाणां रोगिणां च बलाबलम् । वीक्ष्य देशादिकञ्चापि विषमात्रां प्रकल्पयेत् ॥६५॥ वत्सनाभविषस्य मात्रा कलांशतो रक्तिकाया वस्वशप्रमितं विषम् । विमलं विनियुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥६६॥ विषं भवति पीयूषममृतं मात्रया विनियोजितम् । मात्रा च रोगिदेशकाल- बलापेक्ष्येति बोधयति तस्मात् पूर्वन्विति । रक्तिकायाः षोडशांशतः अष्टमांश- पर्यन्तमस्य मात्रानिर्धारणम् ॥६४-६६॥ भा.टी.—वत्सनाभ को यदि मात्रापूर्वक सब बातों का ध्यान रखते हुए प्रयोग किया जाय तो यह शरीर में अमृत का कार्य करता है अर्थात् जीवन- दान करनेवाला होता है। यदि इसे अधिक मात्रा में सेवन किया जाय तो हृदय क्रिया को बन्द करके यह जीवन ही नष्ट कर देता है। अतः विषप्रयोग करने के पूर्व रोग और रोगी का बलाबल और देश, काल, अवस्था, प्रकृति, सात्म्य आदि का पूर्ण विचार करके विष की मात्रा निर्धारित करनी चाहिये। रोग और रोगी का बलाबल देश काल आदि का निश्चय करके रत्ती के सोल- हवें भाग से लेकर रत्ती का आठवाँ भाग तक वत्सनाभ की मात्रा प्रयोग करनी चाहिये ॥६४-६६॥ अथ वत्सनाभविषस्य आमयिकः प्रयोगः । मृत्युञ्जयरसः अमृतं द्विगुणामलेज्जुलाढ्यं त्रिदिनं त्वार्द्रकवारिणा निपिष्टम् । बलिमागधिकामारचटङ्कैः समभागैः परिपेषयेन्मकासम् ॥६७॥