रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६६२ रसतरङ्गिणी रसोऽयं निम्बूकद्रावैर्निहन्ति विषमज्वरम् ॥ ७५ ॥ पिप्पलीमधुसंयुक्तो रसोऽयं परिशीलितः । नवज्वरायमानन्तु जीर्णज्वरमपोहति ॥ ७६ ॥ सोत्सेधारक्तशिश्राग्रं सदाहं वेदनान्वितम् । निहन्त्यारम्भवेलायामौपसर्गिकमेहकम् ॥ ७७ ॥ भा.टी.-फुप्फुस शोथ रोग ( निमोनिया ) में प्रारम्भ के पहिले और दूसरे दिन जब कि ज्वर बहुत तीव्र हो और रोगी का मुखमंडल लाल दिखाई देता हो और भयंकर कष्टदायक कास के साथ श्वास की अधिकता हो तो इस रस के प्रयोग करने से रोग का प्रभाव कम पड़ता जाता है। इस रस को तीव्र ज्वर- वेग युक्त और अजीर्ण तथा आध्मान सहित उदरकृमि-रोग में प्रयोग करने से शीघ्र लाभ होता है। हृदय में शोथ के कारण अथवा अन्य किसी शारीरिक भीतरी अंग के शोथ के कारण होनेवाले ज्वरों की प्रथमावस्था में इस रस का प्रयोग करने से शीघ्र ही इन रोगों के प्रभाव को शान्त कर देता है। अजीर्ण और आध्मान युक्त नूतन सन्निपातज्वर में इस रस को निम्बू के स्वरस के साथ अन्तः प्रयोग करने से शीघ्र ही सन्निपात ज्वर में लाभ होता है। अंग गौरव और अरुचि के साथ आम या निराम लक्षण युक्त विषमज्वर में इसको नीबू के रस के साथ सेवन कराने से आराम आता है। नवीन जीर्ण ज्वर में इस रस को पिप्पलीचूर्ण और शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से आराम आता है। औपसर्गिकमेह अर्थात् सुजाक की प्रथमावस्था में जब इन्द्रिय के अग्रभाग में बहुत शोथ और लालिमा के साथ तीव्र दाह और वेदना हो तो इसके प्रयोग से ये सब लक्षण शान्त हो जाते हैं ॥ ७१-७७ ॥ हिंगुलेश्वरो रसः अमृतं त्रिमलं युगतोलमितं दरदं च कणासममेव समम् । परिपेष्य भृशं खलु सार्द्धयवप्रमिता वटिका विदधीत बुधः ॥७८॥ रसोऽयं तु समाख्यातो विबुधैर्हिङ्गुलेश्वरः । आमवातप्रशमनस्तथा वातज्वरापहः ॥ ७६ ॥ हिंगुलेश्वरः— शुद्धविषं द्वितोलकम्, हिंगुलं द्वितोलकम्, पिप्पली द्वि- तोलकमिता । वारिणा पेषयित्वा सार्धयवप्रमिताः वटिकाः विधेयाः । सोऽयमाम- वातादिशमनः ॥ ७८, ७६ ॥ भा.टी.-शुद्धवत्सनाभ दो तोला और पिप्पलीचूर्ण दो तोला, इन सबको