रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्विंशस्तरङ्गः ६८७ प्रयोग से अनेक विध कारणों से होनेवाली तथा शरीर के विभिन्न प्रदेशों की अनेक प्रकार की वेदनाओं को भी नष्ट करती है । नेत्र दुखने पर इसके लेप से लाभ होता है । कान में शूल होने पर इसके योग कान में डालने से शूल को नष्ट करते हैं । दाँतों में कीड़ा लगने से होनेवाले शूल तथा आम वातिक शूल में भी इसका लेप तथा प्रयोग किया जाता है । बवासीर तथा गुदा के फटने पर इसके लेप लगाये जाते हैं । व्रणों में होनेवाली पीड़ा को यह शान्त करती है और नाड़ियों की उत्तेजना को भी शान्त करती है ॥ २५६-२६१ ॥ अहिफेनस्य मात्रा आरभ्य गुञ्जापादांशाद् गुञ्जैकप्रमितं शुभम् । अहिफेनं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ २६२ ॥ भा.टी.-रोग तथा रोगी का बल, अवस्था, देश काल आदि को पूर्ण विचार करके अफीम को चौथाई रत्ती से लेकर एक रत्ती की मात्रा तक देना चाहिए ॥ २६२ ॥ अहिफेनस्य आमयिकः प्रयोगः पिण्डखर्जूरसंयुक्तं फणिफेनं तु शीलितम् । नाशयत्यचिरादेव गर्भस्रावमसंशयम् ॥ २६३ ॥ अर्कमूलत्वचाचूर्णसंयुक्तं त्वहिफेनकम् । शीलितं त्वचिरादेव विनिहन्ति प्रवाहिकाम् ॥ २६४ ॥ एलालाक्षारजोयुक्तं फणिफेनं तु शीलितम् । रक्तस्रावं निहन्त्याशु फुफ्फुसोत्थं सुदारुणम् ॥ २६५ ॥ रसाञ्जनसमायुक्तं शिलाघृष्टं त्वफेनकम् । योजितं विनिहन्त्याशु त्वभिष्यन्दभवां रुजम् ॥ २६६ ॥ भा.टी.-गर्भस्राव में अफीम को पिण्ड खजूर में मिलाकर देने से गर्भ- स्राव शीघ्र ही रुक जाता है । प्रवाहिका में अफीम को आक की जड़ की छाल के चूर्ण में मिलाकर सेवन कराने से शीघ्र आराम आता है । फेफड़ों से होने- वाले भयंकर रक्तस्राव को रोकने के लिए अफीम को छोटी इलायची तथा लाक्षाचूर्ण में मिलाकर प्रयोग करने से शीघ्र रक्तस्राव बन्द हो जाता है। आँख दुखने की पीड़ा को शान्त करने के लिए अफीम को रसौंत के साथ जल में घिस कर नेत्रों के बाहर लेप लगाने से शीघ्र पीड़ा बन्द हो जाती है ॥२६३-२६६॥ वेदनान्तकरासः अहिफेनं सुविमलं माषकत्रयसंमितम् ।