रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context६६८ रसतरङ्गिणी घनसारं समं तुल्यां पारसीकयवानिकाम् ॥ २६७ ॥ रससिन्दूरकञ्चैव रसमाषकसंमितम् । आदाय पेषयेद्यत्नाद् विजयाद्रवयोगतः ॥ २६८ ॥ निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिकाद्वयसंमिता । रसोऽयं तु समाख्यातो वेदनान्तकसंज्ञकः ॥ २६६ ॥ रसोऽयमम्भसा युक्तो विनिहन्ति विशेषतः । विविधोत्थानसंस्थानां वेदनां विविधाश्रयाम् ॥ २७० ॥ वेदनान्तकरसः—सर्वविधव्यथानाशाय प्रशस्ततमः । घनसारं कर्पूरम् । रस- सिन्दूरं रसमाषकं षण्माषकम् ॥ २६७-२७० ॥ भा.टी.—पूर्वोक्त विधि से शुद्ध की हुई अफीम तीन माशे, खुरासानी अजवायनचूर्ण छः मासे, रससिन्दूर छः मासे लेकर सब को एकत्र खरल में डालकर भाँग की पत्तियों के रस मर्दन करके दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें । इसको वेदनान्तक रस नाम से कहा जाता है । इस रस को जल के साथ सेवन कराने के अनेकविध कारणजन्य और अनेकविध लक्षणयुक्त शरीर के विविध प्रदेश की वेदना शान्त होती है ॥ २६७-२७० ॥ निद्रोदयरसः अहिफेनं सुविमलं रसमाषकसंमितम् । तन्मितां च तुगाक्षीरीं रससिन्दूरकं तथा ॥ २७१ ॥ धात्रीचूर्णं तोलकैकं समादाय भिषग्वरः । विभावयेत्प्रयत्नेन विजयावारिणा त्रिधा ॥ २७२ ॥ निर्मापयेत्तु वटिका रक्तिद्वितयसंमिताः । रसोऽयं तु समाख्यातो निद्रोदयसमाह्वयः ॥ २७३ ॥ तत्तद्गदैर्वेदनयार्दितानां पुंसां सुखस्वापकरोऽतिवेलम् । यथार्थनामा समुदीरितोऽयं रसस्तु निद्रोदयनामधेयः ॥ २७४ ॥ भा.टी.—अच्छी तरह शुद्ध की हुई अफीम छः मासा, वंशलोचन चूर्ण छः मासा, रससिन्दूर छः मासा, आँवलों का चूर्ण एक तोला लेकर सबको एकत्र खरल में डालकर भाँग की पत्तियों के स्वरस से तीन भावना देवें । जब गोली बनाने योग्य हो जाय तो दो रत्ती की गोलियाँ बनाकर सुखा लें । इसको निद्रोदय रस के नाम से कहा जाता है । यह रस विभिन्न रोगों की पीड़ा से दुःखी रोगियों को शीघ्र