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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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Page 769

७४४ रसतरङ्गिणी स्नुहीक्षीरस्य शोधनम् पलद्वयं सुधादुग्धं तोलकद्वयसंमिते । चिञ्चादलद्रवे वस्त्रपूते घर्मे विशोषयेत् ॥५१७॥ द्रवं विशुष्कं विज्ञाय सुधादुग्धं समाहरेत् । ततः सर्वत्र योगेषु प्रयुञ्जीत भिषग्वरैः ॥५१८॥ प्रथमशोधनप्रकारे चिञ्चा अम्लिका, तस्याः पत्ररसो ग्राह्यः । केचित्तु “अर्क- सेहुण्डयोर्दुग्धं तत्स्वयं शुद्धमुच्यते” इत्यप्याहुः ॥५१७, ५१८॥ भा.टी.—दो पल थोहर के दूध को, कपड़छान किये इमली के पत्तों के दो तोले रस में धूप में रखकर सुखा लें । जब द्रवांश सूख जाय तो शुद्ध थोहर के दूध को रख लें और सब जगह प्रयोग करें ॥५१७,५१८॥ स्नुहीक्षीरस्य गुणाः सुधादुग्धं वातहरं गुल्मोदरविनाशनम् । विषाध्मानहरं चैव गुदांकुरहरं परम् ॥५१६॥ परं विरेचनकरं पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगम् । समाख्यातं विशेषेण क्षारकर्मकरं परम् ॥५२०॥ गुणपाठे—पुष्पकृच्चाक्षिमध्यगमिति । अक्षिमध्यपतितं पुष्पाख्यं "फुला" इतिख्यातं रोगं करोति ॥५१६,५२०॥ भा.टी.—थोहर का दूध वातहर तथा गुल्म और उदररोग नाशक है। विष प्रभाव तथा आध्मान और गुदांकुर (मस्से) को नष्ट करने में उत्तम प्रभाव रखता है । अंतःप्रयोग में यह अत्यन्त विरेचक है। यदि यह आँख में पड़ जाय तो इससे आँख में फूला पड़ जाता है और बाहर किसी स्थान पर लगाने पे क्षारकर्म (जलानेवाला) करता है ॥५१६, ५२०॥ अस्य आमयिकः प्रयोगः सुधादुग्धं निशाकोषातकी सैन्धवसंयुतम् । गोमूत्रेण प्रलिप्तं तु पातयेद् गुदजांकुरान् ॥५२१॥ भा.टी.—हरिद्रा, खेखसा, सेंधानमक के साथ थूहर का दूध गोमूत्र में मिलाकर अर्श पर लेप किया जाय तो अर्शाङ्कुर दूर होता है ॥५२१॥ क्षारवर्तिका चूर्णं दारुहरिद्रायास्तोलकैकमितं हरेत् । मासाद्धं पेषयेद्द्वारा निदाघे खलु शोषयेत् ॥५२२॥

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