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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 770 of 799

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Page 770

चतुर्विंशस्तरङ्गः ७४५ समांशिके सुधादुग्धे रविदुग्धे च तन्मिते । निक्षिप्य खलु खल्वेऽथ पेषयेदति यत्नतः ॥५२३॥ विज्ञाय वर्तिकायोग्यं रसतन्त्रविशारदः । दीर्घा एषणिकाकारा वर्तिकाः कारयेत्ततः ॥५२४॥ समाख्याता भिषग्वर्यैर्नामतः क्षारवर्तिकाः । भगन्दरमहाघोरनाडीव्रणविशोधिकाः ॥५२५॥ वर्तिकेयं सुविन्यस्ता प्रयत्नेन भगन्दरे । नाडीव्रणान्तराले च खलु शोधयति द्रुतम् ॥५२६॥ रोगयोग्यप्रयोगे क्षारवर्तिका—मासार्धे पञ्चदशदिनानि । एतावत्कालं पेष- णञ्च सुश्लक्ष्णतासम्पादनाय । निगदव्याख्यातमन्यत् ॥५२२-५२६॥ भा.टी.—दारुहल्दी का चूर्ण एक तोला लेकर इसको खरल में डालकर जल के साथ पन्द्रह दिन तक अच्छी तरह मर्दन करके धूप में सुखा लें। अब इसमें एक तोला थोहर का दूध और एक तोला आक का दूध मिलाकर खरल में फिर मर्दन करें, जब बत्ती बनाने योग्य हो जाय तो इसकी लम्बी-लम्बी सींक की तरह की बत्तियाँ बना लें। इनको क्षारवर्ति कहा जाता है और ये भग- न्दर तथा भयंकर नाड़ीव्रण को शुद्ध करने के काम आती हैं। इन वर्त्तियों की भगन्दर में अथवा नाड़ीव्रण के भीतर अच्छी तरह रखा जाय तो इससे शीघ्र ही व्रण शुद्ध हो जाते हैं ॥५२२-५२६॥ क्षारसूत्रम् सुधादुग्धे वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णसंयुते । निक्षिप्तेन तु तूलेन स्वल्पेन खलु यत्नतः ॥५२७॥ प्रलिप्तं सुदृढं सूत्रं छायायामथ शोषयेत् । विलिप्य सप्तधा ह्येवं शोषयेद् भिषजां वरः ॥५२८॥ सूत्रमेतत्समाख्यातं क्षारसूत्रं तु नामतः । गुदांकुरच्छेदनार्थममोघास्त्रमिदं मतम् ॥५२६॥ भगन्दरच्छेदनार्थमप्येतद्विनियुज्यते । प्रयोक्तव्यं क्षारसूत्रं सावधानतया सदा ॥५३०॥ क्षारसूत्रम्—वस्त्रपूतहरिद्राचूर्णाक्ते सेहुण्डदुग्धे सिक्तेन स्वल्पेन तूलकेन सुदृढं तनु वर्तितं सूत्रमादाय लेपयेत् । एवं सप्तधा शुष्कं तच्छेदने-समर्थं भवति । प्रयोगकाले सावधानता न्यूनाधिकच्छेदभयात् । क्षारसूत्रबन्धनं च यावच्छेदो न