ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहमारी रक्षा करो. (४) सूक्त—४७ देवता—जल आपो यं वः प्रथमं देवयन्त इन्द्रपानमूर्निमकृण्वतेळः. तं वो वयं शुचिमरिप्रमद्य घृतप्रुषं मधुमन्तं वनेम.. (१) हे जलरूप देवो! देवाभिलाषी अध्वर्युओं ने तुम्हारी सहायता से इंद्र के पीने के योग्य, धरती से उत्पन्न जो सोमरस पहले तैयार किया था, इस समय हम भी तुम्हारे उसी शुद्ध, पापरहित, वर्षारूपी जल से सींचने योग्य एवं मधुर सोमरस का सेवन करेंगे. (१) तमूर्मिमापो मधुमत्तं वोऽपां नपादवत्वाशुहेमा. यस्मिन्निन्द्रो वसुभिर्मादयाते तमश्याम देवयन्तो वो अद्य.. (२) हे अप देवो! तुम्हारे उस मधुर सोम नामक रस की शीघ्रगति वाले अपांनपात् अर्थात् अग्नि रक्षा करें. वसुओं के साथ इंद्र जिस में प्रसन्न होते हैं, हम आज देवों की कामना करते हुए उसी का सेवन करेंगे. (२) शतपवित्राः स्वधया मदन्तीर्देवीर्देवानामति यन्ति पाथः. ता इन्द्रस्य न मिनन्ति व्रतानि सिन्धुभ्यो हव्यं घृतवज्जुहोत.. (३) सैकड़ों पवित्र रूपों वाले एवं अपने अन्न के द्वारा मनुष्यों को प्रसन्न करते हुए जल देव इंद्रादि देवों के भी स्थान में प्रवेश करते हैं. वे इंद्र के यज्ञकर्मों का विनाश नहीं करते हैं. हे अध्वर्युजनो! सिंधु के लिए घी से मिले हव्य का हवन करो. (३) याः सूर्यो रश्मिभिराततान याभ्य इन्द्रो अरदद् गातुमूर्मिम्. ते सिन्धवो वारिवो धातना नो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः.. (४) हे सिंधुरूप जलो! सूर्य अपनी किरणों द्वारा जिनका विस्तार करते हैं एवं जिनके लिए इंद्र ने गमनयोग्य मार्ग का उद्घाटन किया है, तुम वे ही हो. तुम हमारे लिए धन धारण करो. हे देवो! तुम कल्याणसाधनों द्वारा हमारी सदा रक्षा करो. (४) सूक्त—४८ देवता—ऋभु ऋभुक्षणो वाजा मादयध्वमस्मे नरो मघवानः सुतस्य. आ वोऽर्वाचः क्रतवो न यातां विभ्वो रथं नर्यं वर्तयन्तु.. (१) हे नेता एवं धनस्वामी ऋभुओ! तुम हमारा सोमरस पीकर मतवाले बनो. अब तुम जाओ. तुम्हारे कार्यकर्त्ता एवं समर्थ अश्व तुम्हारे मानवहितकारी रथ को हमारी ओर मोड़ें. (१) ebook converter DEMO Watermarks*