ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1150 of 1855
Read in contextउभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः. सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम्.. (२) हे उज्ज्वल वर्ण वाली सरस्वती! तुम्हारी महिमा से मनुष्य दिव्य एवं पार्थिव दोनों प्रकार का अन्न प्राप्त करता है. तुम रक्षा वाली बनकर हमें जानो एवं मरुतों की सखी के रूप में हव्यदाताओं को धन प्रदान करो. (२) भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती. गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत्.. (३) कल्याण करने वाली सरस्वती हमारा कल्याण ही करें. शोभन गति वाली एवं अन्नस्वामिनी सरस्वती हम में बुद्धि उत्पन्न करें. मैं जमदग्नि के समान तुम्हारी स्तुति कर रहा हूं. तुम वसिष्ठ अर्थात् मेरे उपर्युक्त स्तोत्र पाओ. (३) जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः. सरस्वन्तं हवामहे.. (४) पत्नी एवं पुत्र की कामना करने वाले एवं शोभन दानयुक्त हम स्तोता नामक देव की स्तुति करते हैं. (४) ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः. तेभिर्नोऽविता भव.. (५) हे सरस्वन् देव! तुम्हारा जो जलसमूह रसयुक्त एवं वर्षा करने वाला है, उसीसे हमारी रक्षा करो. (५) पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः. भक्षीमहि प्रजामिषम्.. (६) हम सबके दर्शनीय एवं बुद्धिशाली सरस्वन् देव के जलधारक स्तोत्र को पाकर बुद्धि एवं अन्न प्राप्त करें. (६) सूक्त—९७ देवता—इंद्र आदि यज्ञे दिवो नृषदने पृथिव्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति. इन्द्राय यत्र सवनानि सुन्वे गमन्मदाय प्रथमं वयश्च.. (१) जिस यज्ञ में देवों की कामना करने वाले ऋत्विज् प्रसन्न होते हैं, जिस यज्ञ में धरती के नेता इंद्र के निमित्त हर बार सोमरस निचोड़ते हैं, इंद्र प्रसन्नता पाने के लिए उसी यज्ञ में स्वर्ग से सर्वप्रथम आवें एवं उनके घोड़े भी आवें. (१) आ दैव्या वृणीमहेऽवांसि बृहस्पतिर्नो मह आ सखायः. यथा भवेम मीळहुषे अनागा यो नो दाता परावतः पितेव.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*