ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextसूक्त—१०० देवता—विष्णु नू मर्तो दयते सनिष्यन्यो विष्णव उरुगायाय दाशत्. प्र यः सत्राचा मनसा यजात एतावन्तं नर्यमाविवासात्.. (१) जो मनुष्य बहुत से लोगों द्वारा प्रशंसायोग्य विष्णु को हव्य देता है, एक साथ बहुत से मंत्र बोलकर पूजा करता है एवं मानवहितकारी विष्णु की सेवा करता है, वह मनुष्य अपने इच्छित धन को शीघ्र प्राप्त करता है. (१) त्वं विष्णो सुमतिं विश्वजन्यामप्रयुतामेवयावो मतिं दाः. पर्चो यथा नः सुवितस्य भूरेरश्वावतः पुरुश्चन्द्रस्य रायः.. (२) हे विष्णु! तुम हम पर ऐसी कृपा करो जो सबका हित करने वाली एवं दोषहीन हो. तुम ऐसी कृपा करो, जिससे भली प्रकार प्राप्त करने योग्य, अनेक अश्वों से युक्त एवं बहुतों को प्रसन्न करने वाला धन प्राप्त हो. (२) त्रिर्देवः पृथिवीमेष एतां वि चक्रमे शतर्चसं महित्वा. प्र विष्णुरस्तु तवसस्तवीयान्त्वेषं ह्यस्य स्थविरस्य नाम.. (३) विष्णुदेव ने सौ किरणों वाली धरती पर अपनी महिमा से तीन बार चरण रखा. वृद्धों से भी वृद्ध विष्णु हमारे स्वामी हों. वृद्धिप्राप्त विष्णु का रूप तेजशाली है. (३) वि चक्रमे पृथिवीमेष एतां क्षेत्राय विष्णुर्मनुषे दशस्यन्. ध्रुवासो अस्य कीरयो जनास उरुक्षितिं सुजनिमा चकार.. (४) धरती को मानवों के निवास के निमित्त देने के विचार से विष्णु ने उस पर तीन बार चरण रखे. विष्णु के स्तोता निश्चल हो जाते हैं. शोभन जन्म वाले विष्णु ने विस्तृत निवासस्थान बनाया है. (४) प्र तत्ते अद्य शिपिविष्ट नामार्यः शंसामि वयुनानि विद्वान्. तं त्वा गृणामि तवसमत्व्यान्-क्षयन्तमस्य रजसः पराके.. (५) हे तेजस्वी विष्णु! स्तुतियों के स्वामी एवं जानने योग्य बातों को जानने वाले हम आज तुम्हारे प्रसिद्ध नाम को कहेंगे. हम वृद्धिरहित होकर भी अत्यंत वृद्धिशाली तुम्हारी स्तुति करेंगे. तुम रज अर्थात् धरालोक के परे रहते हो. (५) किमित्ते विष्णो परिचक्ष्यं भूत्प्र यद्ववक्षे शिपिविष्टो अस्मि. मा वर्पो अस्मदप गूह एतद्यदन्यरूपः समिथे बभूथ.. (६) हे विष्णु! मैं तुम्हारा नाम किरणों से युक्त बताता हूं. इस नाम को स्वीकार न करना क्या ebook converter DEMO Watermarks*