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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1162 of 1855

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Page 1162

(१४) अद्या मुरीय यदि यातुधानो अस्मि यदि वायुस्ततप पूरुषस्य. अधा स वीरैर्दशभिर्वि यूया यो मा मोघं यातुधानेत्याह.. (१५) मैं वसिष्ठ यदि राक्षस होऊं अथवा मैं पुरुषों का जीवन नष्ट करता होऊं तो मैं आज ही मर जाऊं. नहीं तो जो मुझे व्यर्थ ही राक्षस कहकर पुकारता है, उसके दस वीर पुत्र मर जावें. (१५) यो मायातुं यातुधानेत्याह यो वा रक्षाः शुचिरस्मीत्याह. इन्द्रस्तं हन्तु महता वधेन विश्वस्य जन्तोरधमस्पदीष्ट.. (१६) जो राक्षस मुझ अराक्षस को राक्षस कहता है एवं स्वयं को पवित्र बतलाता है, उसे इंद्र अपने महान् आयुधों द्वारा नष्ट कर दें. वह सभी प्राणियों की अपेक्षा अधम बनें. (१६) प्र या जिगाति खर्गलेव नक्तमप द्रुहा तन्वं१ गृहमाना. वव्राँ अनन्ताँ अव सा पदीष्ट ग्रावाणो घ्नन्तु रक्षस उपब्दैः.. (१७) जो राक्षस रात के समय उल्लू के समान अपना शरीर छिपाकर चलता है, वह नीचे को मुंह करके गहरे गड्ढे में गिरे. सोमरस कुचलने के पत्थर भी अपने शब्दों से उसे नष्ट करें. (१७) वि तिष्ठध्वं मरुतो विश्वि१च्छत गृभायत रक्षसः सं पिनष्टन. वयो ये भूत्वी पतयन्ति नक्तभिर्ये वा रिपो दधिरे देवे अध्वरे.. (१८) हे मरुतो! तुम प्रजाओं में अनेक प्रकार से स्थित बनो. जो राक्षस रात में पक्षी बनकर नीचे उतरते हैं अथवा जो प्रज्वलित यज्ञ में बाधा डालते हैं, उन्हें अपनी इच्छानुसार पकड़ो एवं पीस डालो. (१८) प्र वर्तय दिवो अश्मानमिन्द्र सोमशितं मघवन्त्सं शिशाधि. प्राक्तादपाक्तादधरादुदक्तादभि जहि रक्षसः पर्वतेन.. (१९) हे इंद्र! अंतरिक्ष से अपना वज्र चलाओ. हे धनस्वामी इंद्र! सोमरस के कारण शीघ्र कार्य करने वाले यजमान को शुद्ध करो. तुम अपने पर्वों वाले वज्र द्वारा पूर्व, पश्चिम, दक्षिण एवं उत्तर में वर्तमान राक्षसों को नष्ट करो. (१९) एत उ त्ये पतयन्ति श्वयातव इन्द्रं दिप्सन्ति दिप्सवोऽदाभ्यम्. शिशीते शक्रः पिशुनेभ्यो वधं नूनं सृजदशनिं यातुमद्भ्यः.. (२०) जो राक्षस कुत्तों के समान झपटते हैं एवं जो अहिंसनीय इंद्र की हिंसा करना चाहते हैं, eBook converter DEMO Watermarks*

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