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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1431 of 1855

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स पवस्व विचर्षण आ मही रोदसी पृण. उषाः सूर्यो न रश्मिभिः.. (५) हे सूर्यदर्शक सोम! तुम नीचे की ओर गिरो एवं उस रस से विस्तृत द्यावा-पृथिवी को इस प्रकार पूर्ण कर दो, जिस प्रकार सूर्य किरणों से दिन को पूर्ण करता है. (५) परि णः शर्मयन्त्या धारया सोम विश्वतः. सरा रसेव विष्टपम्.. (६) हे सोम! नदियां अपनी धारा से जिस प्रकार भूलोक को पूर्ण करती हैं, उसी प्रकार तुम अपनी सुखकारी धारा के द्वारा हमें चारों ओर से पूर्ण करो. (६) सूक्त—४२ देवता—सोम जनयन्न्रोचना दिवो जनयन्नप्सु सूर्यम्. वसानो गा अपो हरिः.. (१) ये हरे रंग के सोम द्युलोकसंबंधी नक्षत्र, ग्रह आदि को तथा अंतरिक्ष में सूर्य को उत्पन्न करते हैं. इसके बाद नीचे बहने वाले जल से धरती को ढकते हैं. (१) एष प्रत्नेन मन्मना देवो देवेभ्यस्परि. धारया पवते सुतः.. (२) प्राचीन स्तोत्र के साथ निचुड़ते हुए ये सोम अपनी धारा से देवों के लिए सब ओर से गिरते हैं. (२) वावृधानाय तूर्वये पवन्ते वाजसातये. सोमाः सहस्रपाजसः.. (३) असीमित शक्ति वाले सोम बढ़े हुए अन्न को शीघ्र पाने के लिए निचोड़े जाते हैं. (३) दुहानः प्रत्नमित्पयः पवित्रे परि षिच्यते. क्रन्दन्देवाँ अजीजनत्.. (४) सोम प्राचीन रस को टपकाते हुए दशापवित्र पर सींचे जाते हैं एवं शब्द करते हुए देवों को अपने समीप उत्पन्न करते हैं. (४) अभि विश्वानि वार्याभि देवाँ ऋतावृधः. सोमः पुनानो अर्षति.. (५) निचोड़े जाते हुए ये सोम सभी वरण करने योग्य धनों एवं यज्ञवर्धक देवों के पास जाते हैं. (५) गोमन्नः सोम वीरवदश्वावद्वाजवत्सुतः. पवस्व बृहतीरिषः.. (६) हे सोम! तुम निचुड़कर हमें गायों, बहुत सी संतानों, घोड़ों तथा संग्राम में प्राप्त धनों के साथ बहुत सा अन्न दो. (६) ebook converter DEMO Watermarks*

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