ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1432 of 1855
Read in contextसूक्त—४३ देवता—सोम यो अत्य इव मृज्यते गोभिर्मदाय हर्यतः. तं गीर्भिर्वासयामसि.. (१) जो सुंदर सोम चलने वाले घोड़े के समान देवों के नशे के लिए गाय के दूध-दही आदि में मिलाए जाते हैं, स्तुतियों द्वारा हम उन्हीं को प्रसन्न करेंगे. (१) तं नो विश्वा अवस्युवो गिरः शुम्भन्ति पूर्वथा. इन्दुमिन्द्राय पीतये.. (२) रक्षा की अभिलाषिणी हमारी सब स्तुतियां इंद्र के पीने के लिए सोम को पहले के समान ही दीप्तिशाली बनाती हैं. (२) पुनानो याति हर्यतः सोमो गीर्भिः परिष्कृतः. विप्रस्य मेध्यातिथेः.. (३) निचुड़ते हुए सुंदर सोम स्तुतियों से सुशोभित होकर मुझ मेधावी मेध्यातिथि के कल्याण के लिए द्रोणकलश में जाते हैं. (३) पवमान विदा रयिमस्मभ्यं सोम सुश्रियम्. इन्दो सहस्रवर्चसम्.. (४) हे निचुड़ते हुए एवं छनते हुए सोम! तुम हमें शोभनश्री से युक्त एवं बहुत दीप्ति वाला धन दो. (४) इन्दुरत्यो न वाजसृत्कनिक्रन्ति पवित्र आ. यदक्षारति देवयुः.. (५) सोम युद्ध में जाने वाले घोड़े के समान दशापवित्र में शब्द करते हैं. सोम जब नीचे टपकते हैं, तब देवों के अभिलाषी बनकर शब्द करते हैं. (५) पवस्व वाजसातये विप्रस्य गृणतो वृधे. सोम रास्व सुवीर्यम्.. (६) हे सोम! स्तुति करने वाले मुझ मेध्यातिथि को अन्न देने एवं बढ़ाने के लिए टपको. तुम हमें शोभन शक्ति वाला पुत्र दो. (६) सूक्त—४४ देवता—पवमान सोम प्र ण इन्दो महे तन ऊर्मिं न बिभ्रदर्षसि. अभि देवाँ अयास्यः.. (१) हे सोम! तुम हमें महान् धन देने के लिए आते हो. अयास्य ऋषि तुम्हारी तरंगों को धारण करते हुए पूजा करने के लिए देवों की ओर आते हैं. (१) मती जुष्टो धिया हितः सोमो हिन्वे परावति. विप्रस्य धारया कविः.. (२) eBook converter DEMO Watermarks*