ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextजल की धारा के रूप में नीचे गिरते हैं. (१४) सुता इन्द्राय वज्रिणे सोमासो दध्याशिरः. पवित्रमत्यक्षरन्.. (१५) वज्रधारी इंद्र के लिए निचोड़े गए एवं गाय के दूध से मिश्रित सोम दशापवित्र को पार करके टपकते हैं. (१५) प्र सोम मधुमत्तमो राये अर्ष पवित्र आ. मदो यो देववीतमः.. (१६) हे सोम! तुम अपने अतिशय मादक एवं देवाभिलाषी रस को हमें धन देने के लिए दशापवित्र पर गिराओ. (१६) तमी मृजन्त्यायवो हरिं नदीषु वाजिनम्. इन्दुमिन्द्राय मत्सरम्.. (१७) ऋत्विज् लोग हरे रंग के, शक्तिशाली, नशीले एवं पवित्र हुए उस सोम को इंद्र के लिए जलों में मसलते हैं. (१७) आ पवस्व हिरण्यवदश्वावत् सोम वीरवत्. वाजं गोमन्तमा भर.. (१८) हे सोम! तुम हमारे लिए स्वर्ण, घोड़ों और संतान से युक्त धन बरसाओ एवं हमारे लिए गायों से युक्त धन दो. (१८) परि वाजे न वाजयमव्यो वारेषु सिञ्चत. इन्द्राय मधुमत्तमम्.. (१९) हे ऋत्विजो! तुम युद्धाभिलाषी व अतिशय मधुर सोम को इंद्र के लिए भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर युद्ध के समान सींचो. (१९) कविं मृजन्ति मर्ज्यं धीभिर्विप्रा अवस्यवः. वृषा कनिक्रदर्षति.. (२०) रक्षा की अभिलाषा करते हुए बुद्धिमान् ऋत्विज् उंगलियों की सहायता से मसलने योग्य एवं क्रांतकर्म वाले सोम को मसलते हैं. अभिलाषापूरक एवं शब्द करते हुए सोम धारा के रूप में गिरते हैं. (२०) वृषणं धीभिरप्तुरं सोममृतस्य धारया. मती विप्राः समस्वरन्.. (२१) बुद्धि वाले ऋत्विज् अभिलाषापूरक एवं जल बरसाने वाले सोम को उंगलियों एवं स्तुतियों के साथ जल की धारा के रूप में प्रेरित करते हैं. (२१) पवस्व देवायुषगिन्द्रं गच्छतु ते मदः. वायुमा रोह धर्मणा.. (२२) हे दीप्तिशाली सोम! धारा के रूप में गिरो. तुम्हारा नशीला रस आसक्त इंद्र के पास जावे. तुम अपने धारक रस द्वारा वायु को प्राप्त करो. (२२) ebook converter DEMO Watermarks*