ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1484 of 1855
Read in contextसूक्त—७८ देवता—पवमान सोम प्र राजा वाचं जनयन्नसिष्यददपो वसानो अभि गा इयक्षति. गृभ्णाति रिप्रमविरस्य तान्वा शुद्धो देवानामुप याति निष्कृतम्.. (१) दीप्तिशाली सोम शब्द उत्पन्न करते हुए निचुड़ते हैं एवं जल को आच्छादित करते हुए स्तुतियों को प्राप्त करते हैं. सोम का फोक भेड़ के बालों से बना दशापवित्र ग्रहण करता है. सोम शुद्ध होकर देवों के स्थान को जाते हैं. (१) इन्द्राय सोम परि षिच्यसे नृभिर्नृचक्षा ऊर्मि: कविरज्यसे वने. पूर्वीर्र्हि ते सुतय: सन्ति यातवे सहस्रमश्वा हरयश्चमूर्षद:.. (२) हे सोम! तुम ऋत्विजोँ द्वारा इंद्र के लिए निचोड़े जाते हो. हे मेधावी एवं यज्ञकर्त्ताओं को कृपापूर्वक देखने वाले सोम! तुम प्रेरित होकर जल में मिलते हो. तुम्हारे जाने के लिए बहुत से छिद्र हैं. तुम्हारी हजारों व्याप्त एवं हरे रंग वाली किरणें पत्थरों पर स्थित हैं. (२) समुद्रिया अप्सरसो मनीषिणमासीना अन्तरभि सोममक्षरन्. ता ईं हिन्वन्ति हर्म्यस्य सक्षणिं याचन्ते सुम्नं पवमानमक्षितम्.. (३) अंतरिक्ष में रहने वाली अप्सराएं यज्ञ में बैठकर मेधावी सोम को निचोड़ती हैं. वे यज्ञशाला को सींचने वाले सोम को बढ़ाती हैं एवं उससे अक्षय सुख की याचना करती हैं. (३) गोजिन्न: सोमो रथजिद्धिरण्वजित्स्वर्जिदब्जित्पवते सहस्रजित्. यं देवासश्चक्रिरे पीतये मदं स्वादिष्ठं द्रप्समरुणं मयोभुवम्.. (४) हमारे लिए गायों, रथ, स्वर्ण, स्वर्ग, जल एवं हजारों धनों के जेता सोम पवित्र किए जाते हैं. देवों ने नशीले, अत्यंत स्वादपूर्ण, रसात्मक, लाल रंग वाले एवं सुखद सोम को पीने के लिए बनाया है. (४) एतानि सोम पवमानो अस्मयु: सत्यानि कृण्वन्द्रविणान्यर्षसि. जहि शत्रुमन्तिके दूरके च य उर्वीं गव्यूतिमभयं च नस्कृधि.. (५) हे सोम! तुम इन धनों को हमें वास्तव में देते हुए, शुद्ध होते हुए शुद्ध होते हो. जो शत्रु समीप अथवा दूर स्थित हो, उसे मारो एवं हमारे मार्ग को विस्तृत करके हमें अभय दो. (५) सूक्त—७९ देवता—पवमान सोम अचोदसो नो धन्वन्त्विन्दव: प्र सुवानासो बृहद्दिवेषु हरय:. वि च नशन्न इषो अरातयोऽर्यो नशन्त सनिषन्त नो धिय:.. (१) ebook converter DEMO Watermarks*