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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1492 of 1855

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शब्द करते हुए स्वर्ग के अमृत को दुहते हैं. (९) दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतो वेना दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम्. अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मौ मधुमन्तं पवित्र आ.. (१०) मधुर वचन बोलने वाले वेनगोत्रीय ऋषि यज्ञ के हविर्धान नामक स्थान में अलग-अलग सोमरस निचोड़ते हैं एवं ऊंचे स्थान में स्थित जल बरसाने वाले, जल में बढ़ने वाले एवं रसरूप सोम को सागर के समान विशाल द्रोणकलश में जल की लहरों से सींचते हैं. वे मीठे रस वाले सोम को दशापवित्र में निचोड़ते हैं. (१०) नाके सुपर्णमुपपत्तिवांसं गिरो वेनानामकृपन्त पूर्वीः. शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्ततं हिरण्ययं शकुनं क्षामणि स्थाम्.. (११) द्युलोक में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले एवं गिरने वाले सोम की प्रशंसा हमारी स्तुतियां करती हैं. रोते हुए शिशु के समान शुद्ध करने योग्य, स्वर्णमय, पंखों से युक्त एवं धरती पर स्थित सोम को हमारी स्तुतियां प्राप्त करती हैं. (११) ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थाद्विश्वा रूपा प्रतिचक्षाणो अस्य. भानुः शुक्रेण शोचिषा व्यद्यौत्प्रारूरुचद्रोदसी मातरा शुचिः.. (१२) उन्नत एवं किरणें धारण करने वाले सोम आदित्य के मध्य स्थित होते हैं एवं इस आदित्य के सभी रूपों को देखते हैं. सूर्य में स्थित सोम दीप्त तेज के द्वारा प्रकाशित होते हैं. दीप्ति वाले सूर्य विश्व का निर्माण करने वाली द्यावा-पृथिवी को प्रकाशित करते हैं. (१२) सूक्त—८६ देवता—पवमान सोम प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना. दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते.. (१) हे पवमान सोम! तुम्हारे व्यापक, मन के समान तेज चाल वाले तथा नशीले रस, तेज चलने वाली घोड़ियों के बछड़ों के समान स्वयं ही चलते हैं. स्वर्ग में उत्पन्न, शोभन पत्तों वाले, मधुरतायुक्त एवं अत्यंत नशीले रस द्रोणकलश में जाते हैं. (१) प्र ते मदासो मदिरास आशवोऽसृक्षत रथ्यासो यथा पृथक्. धेनुर्न वत्सं पयसाभि वज्रिणमिन्द्रमिन्दवो मधुमन्त ऊर्मयः.. (२) हे सोम! मदकारक, व्याप्त एवं घोड़े के समान तेज चलने वाले रस अलग-अलग बनाए जाते हैं. वे मधुर व अधिक रस वाले सोम वज्रधारी इंद्र के पास उसी प्रकार जाते हैं, जिस प्रकार दुधारू गाय बछड़े के पास जाती है. (२) ebook converter DEMO Watermarks*