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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

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धरती तथा स्वर्ग के जीवों को अपने-अपने काम में लगाने वाले सोम द्यावा-पृथिवी के मध्य भाग में जाते हैं. (४२) अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते. सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृभ्णते.. (४३) ऋत्विज् सोमरस को गाय के दूध-दही के साथ तरह-तरह से मिलाते हैं एवं उसका स्वाद लेते हैं. वे सोम को मधु के साथ मिश्रित करते हैं. जल के ऊपर उठने पर नीचे की ओर टपकने वाले व तृप्त करने वाले सोम को हिरण्य के द्वारा पवित्र करते हुए ऋत्विज् इस प्रकार जल में जाते हैं, जिस प्रकार पशु स्नान आदि के लिए तालाब में जाते हैं. (४३) विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति. अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीळन्नसरद्वृषा हरिः.. (४४) हे ऋत्विजो! विद्वान् एवं शुद्ध होते हुए सोम के लिए स्तुतियां गाओ. जिस प्रकार वर्षा की विशाल-धारा बाधा को पार करके आगे बढ़ती है, उसी प्रकार सोम रसरूपी अन्न को लांघकर आगे बढ़ते हैं. सांप जिस प्रकार अपनी केंचुली छोड़ता है, उसी प्रकार सोम का रस अपनी लता को छोड़ता है. वर्षा करने वाले व हरितवर्ण सोम घोड़े के समान क्रीड़ा करते हुए दशापवित्र से द्रोणकलश में जाते हैं. (४४) अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः. हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतिरथः पवते राय ओक्यः.. (४५) आगे चलने वाले, सुशोभित व जल में शुद्ध किए गए सोम की स्तुति की जाती है. दिनों का निर्माण करने वाले, जलों में स्थित, हरे रंग वाले, जल उत्पन्न करने वाले, सुंदर, जल से युक्त एवं ज्योतिपूर्ण रथ वाले सोम घर देते हैं. (४५) असर्जि स्कम्भो दिव उद्यतो मदः परि त्रिधातुर्भुवनान्यर्षति. अंशुं रिहन्ति मतयः पनिप्रतं गिरा यदि निर्णिजम्मृग्मिणो ययुः.. (४६) स्वर्गलोक को धारण करने वाले, उन्नत एवं नशीले सोम निचोड़े जाते हैं. तीन धाराओं वाले सोम सारे सवनों में घूमते हैं. जब स्तोता रूप वाले सोम की स्तुतियां करते हैं, तब पुरोहित शब्दयुक्त सोम की कामना करते हैं. (४६) प्र ते धारा अत्यण्वानि मेष्यः पुनानस्य संयतो यन्ति रंहयः. यद् गोभिरिन्दो चम्वोः समज्यस आ सुवानः सोम कलशेषु सीदसि.. (४७) हे सोम! छनते समय तुम्हारी चंचल धाराएं भेड़ के बालों से बने दशापवित्र को पार करके जाती हैं. जब तुम चमू नामक पात्रों के ऊपर जलों के साथ मिलाए जाते हो, उस समय तुम निचोड़ते हुए कलशों में स्थित होते हो. (४७)