ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपवस्व सोम क्रतुविन्न उक्थ्योऽव्यो वारे परि धाव मधु प्रियम्. जहि विश्वान् रक्षस इन्दो अत्रिणो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः.. (४८) हे हमारी स्तुति के जानने वाले व उक्थमंत्रों द्वारा प्रशंसा करने योग्य सोम! तुम हमारे यज्ञ के लिए टपको तथा भेड़ के बालों से बने दशापवित्र पर अपना मधुर रस गिराओ. हे दीप्तिशाली सोम! तुम मानवों का भक्षण करने वाले सब राक्षसों को मारो. शोभन संतान वाले हम महान् धन पाकर यज्ञों में तुम्हारी बहुत स्तुति करेंगे. (४८) सूक्त—८७ देवता—पवमान सोम प्र तु द्रव परि कोशं नि षीद नृभिः पुनानो अभि वाजमर्ष. अश्वं न त्वा वाजिनं मर्य्यन्तोऽच्छा बर्ही रशनाभिर्नयन्ति.. (१) हे सोम! दौड़कर आओ और द्रोणकलश में बैठो. तुम ऋत्विजों द्वारा पवित्र होते हुए यजमान को अन्न दो. अध्वर्युजन यज्ञ में ले जाने के लिए सोम को जल द्वारा इस प्रकार साफ करते हैं, जिस प्रकार शक्तिशाली घोड़े को नहलाया जाता है. (१) स्वायुधः पवते देव इन्दुरशस्तिहा वृजनं रक्षमाणः. पिता देवानां जनिता सुदक्षो विष्टम्भो दिवो धरुणः पृथिव्याः.. (२) शोभन आयुध वाले, दीप्तिशाली, राक्षसों का नाश करने वाले, उपद्रव से रक्षा करने वाले, देवों के पालनकर्त्ता, उत्पन्न करने वाले, शोभन शक्तियुक्त, स्वर्ग को सहारा देने वाले एवं धरती के धारक सोम निचोड़ते हैं. (२) ऋषिविप्रः पुरएता जनानामृभुर्धीर उशना काव्येन. स चिद्विवेद निहितं यदासामपीच्यं १ गुह्यं नाम गोनाम्.. (३) ऋषि, मेधावी, सबके आगे चलने वाले, दीप्तिशाली एवं धीर उशना अपने स्तोत्रों द्वारा गायों में छिपे हुए एवं गोपनीय दूध को प्राप्त करते हैं. (३) एष स्य ते मधुमाँ इन्द्र सोमो वृषा वृष्णे परि पवित्रे अक्षाः. सहस्रसाः शतसा भूरिदावा शश्वत्तमं बर्हिरा वाज्यस्थात्.. (४) हे वर्षा करने वाले इंद्र! तुम्हारे लिए मधुर एवं वर्षक सोम दशापवित्र में होकर छनते हैं. सैकड़ों और हजारों धनों के देने वाले, अधिक धन के दाता, नित्य एवं शक्तिशाली सोम यज्ञ में स्थित रहते हैं. (४) एते सोमा अभि गव्या सहस्रा महे वाजायाऽमृताय श्रवांसि. पवित्रेभिः पवमाना असृग्रञ्छ्रवस्यवो न पृतनाजो अत्याः.. (५)