BharatKosha
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 168 of 1855

Read in context
Page 168

सोमयाग रूप अनेक कर्म आरंभ करता है, तब इंद्र उसका प्रयोजन जानते हैं तथा यजमान की इच्छानुसार वर्षा करने के लिए मरुद्गण के साथ यज्ञस्थान में आने की तैयारी करते हैं. (२) युक्ष्वा हि केशिना हरी वृषणा कक्ष्यप्रा. अथा न इन्द्र सोमपा गिरामुपश्रुतिं चर.. (३) हे सोमपानकर्त्ता इंद्र! अपने केशर वाले, युवा एवं पुष्ट शरीर वाले घोड़ों को रथ में जोड़ो. इसके पश्चात् हमारी स्तुतियां सुनने के लिए समीप आओ. (३) एहि स्तोमाँ अभि स्वराभि गृणीह्या रुव. ब्रह्म च नो वसो सचेन्द्र यज्ञं च वर्धय.. (४) हे सर्वव्यापक इंद्र! इस यज्ञ में आओ. उद्गाता द्वारा की हुई स्तुति की प्रशंसा करो, अध्वर्यु की स्तुतियों का समर्थन करो और अपने शब्दों से सबको आनंद दो. इसके पश्चात् हमारे अन्न के साथ-साथ इस यज्ञ को भी बढ़ाओ. (४) उक्थमिन्द्राय शंस्यं वर्धनं पुरुनिष्षिधे. शक्रो यथा सुतेषु णो रारणत् सख्येषु च.. (५) अगणित शत्रुओं को रोकने वाले इंद्र के लिए गाए गए गीत वृद्धि पाते रहें. इन गीतों के कारण शक्तिशाली इंद्र हमारे पुत्रों एवं मित्रों के मध्य महान् शब्द करें. (५) तमित् सखित्व ईमहे तं राये तं सुवीर्ये. स शक्र उत नः शकदिन्द्रो वसु दयमानः.. (६) हम लोग मैत्री, धन और शक्ति पाने के लिए इंद्र के समीप जाते हैं. बलशाली इंद्र हमें धन प्रदान करके हमारी रक्षा करते हैं. (६) सुविवृतं सुनिरजमिन्द्र त्वादातमिद्यशः. गवामप व्रजं वृधि कृणुष्व राधो अद्रिवः.. (७) हे इंद्र! तुम्हारे द्वारा दिया हुआ अन्न सर्वत्र फैला हुआ और सुविधापूर्वक मिलने वाला है. हे वज्र धारण करने वाले इंद्र! दूध, घी आदि रस के लाभ के लिए गोशाला का द्वार खोलो और हमें धन प्रदान करो. (७) नहि त्वा रोदसी उभे ऋघायमाणमिन्वतः. जेषः स्वर्वतीरपः सं गा अस्मभ्यं धूनुहि.. (८) हे इंद्र! जिस समय तुम शत्रु का वध करते हो, उस समय धरती और आकाश दोनों में ebook converter DEMO Watermarks*