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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 171 of 1855

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सूक्त—१२ देवता—अग्नि अग्निं दूतं वृणीमहे होतारं विश्ववेदसम्. अस्य यज्ञस्य सुक्रतुम्.. (१) देवों के दूत एवं आह्वान करने वाले, समस्त संपत्तियों के अधिकारी एवं इस यज्ञ को सुंदरतापूर्वक पूर्ण कराने वाले अग्नि का हम वरण करते हैं. (१) अग्निमग्निं हवीमभिः सदा हवन्त विशपतिम्. हव्यवाहं पुरुप्रियम्.. (२) हम प्रजापालकर्त्ता, सदा हव्यवहन करने वाले एवं विश्व के प्रिय अग्नि को आवाहक मंत्रों द्वारा सदा बुलाते हैं. (२) अग्ने देवाँ इहा वह जज्ञानो वृक्तबर्हिषे. असि होता न ईड्यः.. (३) हे काष्ठ से उत्पन्न अग्नि! यज्ञ में कुश बिछाने वाले यजमान के निमित्त देवों को बुलाओ, क्योंकि तुम हमारे स्तुत्य एवं होता हो. (३) ताँ उशतो वि बोधय यदग्ने यासि दूत्यम्. देवैरा सत्सि बर्हिषि.. (४) हे अग्नि! तुम देवों का दूतकर्म करते हो, इसलिए हव्य की अभिलाषा करने वाले देवों को बुलाओ एवं उनके साथ बिछे हुए कुशों पर बैठो. (४) घृताहवन दीदिवः प्रति ष्म रिषतो दह. अग्ने त्वं रक्षस्विनः.. (५) हे घी द्वारा बुलाए गए तेजस्वी अग्नि! राक्षसों के सहयोगी बने हुए हमारे शत्रुओं को जला दो. (५) अग्निनाग्निः समिध्यते कविर्गृहपतिर्युवा. हव्यवाड् जुह्वास्यः.. (६) क्रांतदर्शी, गृहरक्षक, युवा, हव्यवाहक एवं जुहूमुख देवता अग्नि अग्नि से ही प्रज्वलित होते हैं. (६) कविमग्निमुप स्तुहि सत्यधर्माणमध्वरे. देवममीवचातनम्.. (७) हे स्तोताओ! क्रांतदर्शी, सत्यशील, शत्रुनाशक एवं दिव्यगुणसंपन्न अग्नि के सामने आकर यज्ञ में उसकी स्तुति करो. (७) यस्त्वामग्ने हविष्पतिर्दूतं देव सपर्यति. तस्य स्म प्राविता भव.. (८) हे अग्नि! क्योंकि तुम हव्य के स्वामी एवं देवों के दूत हो, इसलिए अपने सेवक यजमान के रक्षक बनो. (८) ebook converter DEMO Watermarks*

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