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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 172 of 1855

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Page 172

यो अग्निं देववीतये हविष्माँ आविवासति. तस्मै पावक मृळय.. (९) हे पावक! जो हव्य देने वाले तुम्हारी शरण में आकर इस इच्छा से तुम्हारी सेवा करते हैं कि उनका हव्य देवों को मिल सके, तुम उनकी रक्षा करो. (९) स नः पावक दीदिवोऽग्ने देवाँ इहा वह. उप यज्ञं हविश्च नः.. (१०) हे प्रदीप्त अग्नि! देवों को यहां यज्ञस्थल में लाओ एवं हमारा यज्ञ और हवि देवों के समीप ले जाओ. (१०) स नः स्तवान आ भर गायत्रेण नवीयसा. रयिं वीरवतीमिषम्.. (११) हे अग्नि! नवनिर्मित गायत्री छंद की स्तुति द्वारा प्रसन्न होकर हमें धन एवं संतानयुक्त अन्न दो. (११) अग्ने शुक्रेण शोचिषा विश्वाभिर्देवहूतिभिः. इमं स्तोमं जुषस्व नः.. (१२) हे अग्नि! तुम कांतियुक्त एवं देवदूत के रूप में प्रसिद्ध हो. तुम हमारे इस स्तोत्र को स्वीकार करो. (१२) सूक्त—१३ देवता—अग्नि आदि सुसमिद्धो न आ वह देवाँ अग्ने हविष्मते. होतः पावक यक्षि च.. (१) हे भली प्रकार प्रज्वलित अग्नि! हमारे यजमान के कल्याण के लिए देवों को लाओ. हे देवों को बुलाने वाले पावक! हमारा यज्ञ पूरा करो. (१) मधुमन्तं तनूनपाद् यज्ञं देवेषु नः कवे. अद्या कृणुहि वीतये.. (२) हे क्रांतदर्शी एवं शरीररक्षक अग्नि! हमारे मधुयुक्त यज्ञ को उपभोग के निमित्त देवों के समीप ले जाओ. (२) नराशंसमिह प्रियमस्मिन् यज्ञ उप ह्वये. मधुजिह्वं हविष्कृतम्.. (३) मैं इस यज्ञ में प्रिय, मधुजिह्व, हव्य-संपादक एवं मनुष्यों द्वारा प्रशंसित अग्नि को बुलाता हूं. (३) अग्ने सुखतमे रथे देवाँ ईळित आ वह. असि होता मनुर्हितः.. (४) हे मानवों द्वारा प्रशंसित अग्नि! अपने परम सुखद रथ पर देवों को यहां ले आओ. तुम मानव हितकारी एवं देवों को बुलाने वाले हो. (४) ebook converter DEMO Watermarks*