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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 173 of 1855

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Page 173

स्तृणीत बर्हिरानुषग् घृतपृष्ठं मनीषिणः. यत्रामृतस्य चक्षणम्.. (५) हे मनीषियो! घी से चिकने कुशों को एक-दूसरे से मिलाकर बिछाओ. उस पर अमृत रखा जाएगा. (५) वि श्रयन्तामृतावधो द्वारो देवीरसश्चतः. अद्या नूनं च यष्टवे.. (६) यज्ञ पूरा करने के लिए आज निश्चय ही तेजस्वी एवं जनरहित द्वार खोले जावें. वे बंद न रहें. (६) नक्तोषासा सुपेशसास्मिन् यज्ञ उप ह्वये. इदं नो बर्हिरासदे.. (७) मैं बिछे हुए कुशों पर बैठने के लिए सुंदर रात और उषा को इस यज्ञ में बुलाता हूं. (७) ता सुजिह्वा उप ह्वये होतारा दैव्या कवी. यज्ञं नो यक्षतामिमम्.. (८) मैं अग्नि और सूर्य को बुलाता हूं. वे सुंदर जिह्वा वाले, क्रांतदर्शी और देवों को बुलाने वाले हैं. वे हमारा यज्ञ पूरा करें. (८) इला सरस्वती मही तिस्रो देवीर्मयोभुवः. बर्हिः सीदन्त्वस्रिधः.. (९) सुख देने वाली एवं विनाशरहित इला, सरस्वती तथा मही नामक देवियां कुशों पर बैठें. (९) इह त्वष्टारमग्रियं विश्वरूपमुप ह्वये. अस्माकमस्तु केवलः.. (१०) मैं सर्वाग्रणी तथा अनेक रूपधारी त्वष्टा को इस यज्ञ में बुलाता हूं. वे केवल हमारे ही हों. (१०) अव सृजा वनस्पते देव देवेभ्यो हविः. प्र दातुरस्तु चेतनम्.. (११) हे वनस्पतिदेव! देवों के लिए हवि भेंट करो. इससे यजमान साम से संपन्न बनें. (११) स्वाहा यज्ञं कृणोतनेन्द्राय यज्वनो गृहे. तत्र देवाँ उप ह्वये.. (१२) हे ऋत्विजो! तुम यजमान के घर में स्वाहा शब्द बोलते हुए इंद्र के निमित्त हवन करो. उस में हम देवों को बुलाते हैं. (१२) सूक्त—१४ देवता—अग्नि ऐभिरग्ने दुवो गिरो विश्वेभिः सोमपीतये. देवेभिर्याहि यक्षि च.. (१)