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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 179 of 1855

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यो रेवान् यो अमीवहा वसुवित् पुष्टिवर्धनः. स नः सिषक्तु यस्तुरः.. (२) जो ब्रह्मणस्पति धन के स्वामी, रोगनिवारण करने वाले, संपत्तिदाता, पुष्टिवर्धक एवं शीघ्र फल देने वाले हैं, वे हम पर कृपा करें. (२) मा नः शंसो अररुषो धूर्तिः प्रणङ् मर्त्यस्य. रक्षा णो ब्रह्मणस्पते.. (३) उपद्रव करने वाले एवं द्वेषपूर्ण निंदा के शब्द बोलने वाले शत्रु हमसे दूर रहें. हे ब्रह्मणस्पति! उनसे हमारी रक्षा करो. (३) स घा वीरो न रिष्यति यमिन्द्रो ब्रह्मणस्पतिः. सोमो हिनोति मर्त्यम्.. (४) इंद्र, वरुण और सोम जिस यजमान की उन्नति करते हैं, उस वीर पुरुष का विनाश नहीं होता. (४) त्वं तं ब्रह्मणस्पते सोम इन्द्रश्च मर्त्यम्. दक्षिणा पात्वंहसः.. (५) हे ब्रह्मणस्पति! तुम, सोम, इंद्र एवं दक्षिणा नामक देवी उस यजमान की पाप से रक्षा करो. (५) सदसस्पतिमद्भूतं प्रियमिन्द्रस्य काम्यम्. सनिं मेधामयासिषम्.. (६) आश्चर्यजनक कर्म करने वाले, इंद्र के प्रिय, परम सुंदर एवं धनप्रदाता सदसस्पति (अग्नि) नामक देव के सामने हम बुद्धि की याचना करने आए हैं. (६) यस्मादृते न सिध्यति यज्ञो विपश्चितश्चन. स धीनां योगमिन्वति.. (७) जिन सदसस्पति (अग्नि) की प्रसन्नता के बिना विद्वान् यजमान का यज्ञ भी पूर्ण नहीं होता, वह ही हमारे मन को इस यज्ञ में लगावें. (७) आदृध्नोति हविष्कृतिं प्राञ्चं कृणोत्यध्वरम्. होत्रा देवेषु गच्छति.. (८) इसके बाद वही सदसस्पति (अग्नि) हविसंपादन करने वाले यजमान की उन्नति करते हैं एवं यज्ञ को निर्विघ्नतापूर्वक समाप्त करते हैं. उन्हीं की कृपा से हमारी स्तुतियां देवों के पास जाएं. (८) नराशंसं सुधृष्टममपश्यं सप्रथस्तमम्. दिवो न सद्ममखसम्.. (९) प्रतापी, अत्यंत प्रसिद्ध एवं द्युलोक के समान तेजस्वी नराशंस (अग्नि) देवता को मैं देख चुका हूं. (९) सूक्त—१९ देवता—अग्नि एवं मरुद्गण ebook converter DEMO Watermarks*