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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1842 of 1855

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Page 1842

अमित्रहा वृत्रहा दस्युहंतमं ज्योतिर्जज्ञे असुरहा सपत्नहा.. (२) दीप्तिशाली, विस्तृत, भली-भांति पुष्ट, अन्न का अतिशय दाता, वायु द्वारा धारित, सूर्यमंडल में स्थित, विनाशनरहित, शत्रुघातक, वृत्रहननकर्त्ता, राक्षसों को मारने वालों में श्रेष्ठ, आयुध फेंकने वालों का घातक एवं सहज विरोधियों को समाप्त करने वाला सूर्यरूप तेज प्रकट होता है. (२) इदं श्रेष्ठं ज्योतिषां ज्योतिरुत्तमं विश्वजिद्धनजिदुच्यते बृहत्. विश्वभ्राड् भ्राजो महि सूर्यो दृश उरु पप्रथे सह ओजो अच्युतम्.. (३) सूर्य ज्योतियों में उत्तम ज्योति, श्रेष्ठ, विश्व को जीतने वाले, धन विजय करने वाले एवं विशाल कहलाते हैं. विश्वप्रकाशक, दीप्तिशाली एवं महान् सूर्य देखने के लिए विस्तृत अंधकारनाशक एवं अविनाशी तेज का विस्तार करते हैं. (३) विभ्राजञ्ज्योतिषा स्वर्अगच्छो रोचनं दिवः. येनेमा विश्वा भुवनान्याभृता विश्वकर्मणा विश्वदेव्यावता.. (४) हे सूर्य! तुम अपने तेज से सारे जगत् को प्रकाशित करते हुए दिव्य स्थान में गए थे. सभी कार्यों के हेतु व सभी यज्ञों के अनुकूल सूर्य प्रकाश के द्वारा सारे लोक को भर जाते हैं. (४) सूक्त—१७१ देवता—इंद्र त्वं त्यमिततो रथमिन्द्र प्रावः सुतावतः. अशृणोः सोमिनो हवम्.. (१) हे इंद्र! तुमने सोमरस निचोड़ने वाले त्यट् ऋषि के रथ की रक्षा की एवं सोमधारणकर्त्ता त्यट् की पुकार सुनी. (१) त्वं मखस्य दोधतः शिरोऽव त्वचो भरः. अगच्छः सोमिनो गृहम्.. (२) तुमने भय से कांपते हुए यज्ञ का सिर शरीर से अलग कर दिया. तुम सोमरसधारी त्यट् के घर गए. (२) त्वं त्यमिन्द्र मर्त्यमास्त्रबुध्नाय वेन्यम्. मुहुः श्रथ्ना मनस्यवे.. (३) हे इंद्र! तुमने अस्त्रबुध्न की स्तुति बार-बार सुनकर वेनपुत्र पृथु को उसके वश में कर दिया था. (३) त्वं त्यमिन्द्र सूर्यं पश्चा सन्तं पुरस्कृधि. देवानां चित्तिरो वशम्.. (४) ebook converter DEMO Watermarks*