ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextत्रीणि पदा वि चक्रमे विष्णुर्गोपा अदाभ्यः. अतो धर्माणि धारयन्.. (१८) विष्णु जगत् की रक्षा करने वाले हैं. कोई उन पर प्रहार नहीं कर सकता. उन्होंने संपूर्ण धर्मों को धारण करते हुए तीन डगों में जगत् की परिक्रमा की. (१८) विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे. इन्द्रस्य युज्यः सखा.. (१९) विष्णु की कृपा से उनके भरोसे यजमान अपने व्रत पूरे करते हैं. विष्णु के कार्यों को देखो. वे इंद्र के उपयुक्त सखा हैं. (१९) तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः. दिवीव चक्षुराततम्.. (२०) आकाश के चारों ओर फैली हुई आंखें जिस प्रकार देखती हैं, उसी प्रकार विद्वान् भी विष्णु के स्वर्ग नामक परमपद पर दृष्टि रखते हैं. (२०) तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवांसः समिन्धते. विष्णोर्यत्परमं पदम्.. (२१) बुद्धिमान्, विशेष रूप से स्तुति करने वाले एवं जागरूक लोग विष्णु के उस परम पद से अपने हृदय को प्रकाशित करते हैं. (२१) सूक्त—२३ देवता—वायु आदि तीव्राः सोमास आ गह्याशीर्वन्तः सुता इमे. वायो तान्प्रस्थितान्पिब.. (१) हे वायु! यह तीखा और संतोष देने वाला सोमरस तैयार है. तुम आओ और लाए हुए सोमरस का पान करो. (१) उभा देवा दिविस्पृशेन्द्रवायू हवामहे. अस्य सोमस्य पीतये.. (२) मैं आकाश में रहने वाले इंद्र और वायु दोनों देवों को यह सोमरस पीने के लिए बुलाता हूं. (२) इन्द्रवायू मनोजुवा विप्रा हवन्त ऊतये. सहस्राक्षा धियस्पती.. (३) वायु मन के समान गतिशील एवं इंद्र हजार आंखों वाले हैं. बुद्धिमान् लोग इन्हें अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं. (३) मित्रं वयं हवामहे वरुणं सोमपीतये. जज्ञाना पूतदक्षसा.. (४) मित्र और वरुण यज्ञ में प्रकट होने वाले एवं शुद्धबलसंपन्न हैं. हम उन्हें सोमरस पीने के लिए बुलाते हैं. (४) ebook converter DEMO Watermarks*