ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे राजा वरुण! मुझे किसी धनी एवं दानी पुरुष के सामने अपनी निर्धनता न कहनी पड़े. मेरे पास जीवन के लिए आवश्यक धन की कमी न हो. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत सी स्तुतियां करेंगे. (७) सूक्त—३० देवता—इंद्र आदि ऋतं देवाय कृण्वते सवित्र इन्द्राय़ाहिघ्ने न रमन्त आपः. अहरहर्यात्यक्तुरपां कियात्या प्रथमः सर्ग आसाम्.. (१) वर्षा करने वाले, गतिमान, सबको प्रेरणा देने वाले एवं वृत्रनाशकर्त्ता इंद्र के यज्ञ के लिए पानी कभी नहीं रुकता. जल का प्रवाह प्रतिदिन उसी प्रकार बहता है, जिस प्रकार वह अपनी पहली सृष्टि में हुआ था. (१) यो वृत्राय सिनमत्राभरिष्यत्प्र तं जनित्री विदुष उवाच. पथो रदन्तीरनु जोषमस्मै दिवेदिवे धुनयो यन्त्यर्थम्.. (२) जिस व्यक्ति ने इस पाकशाला में वृत्र असुर को अन्न दिया था, माता अदिति ने उसके विषय में इंद्र को बता दिया. इंद्र की इच्छा के अनुसार नदियां अपना रास्ता बनाती हुई प्रतिदिन समुद्र के पास जाती हैं. (२) ऊर्ध्वो ह्यस्थादध्यन्तरिक्षेऽधा वृत्राय प्र वधं जभार. मिहं वसान उप हीमदुद्रोत्तिग्मायुधो अजयच्छत्रुमिन्द्रः.. (३) इस वृत्र ने आकाश में ऊपर उठकर सब पदार्थों को ढक लिया था, इसलिए इंद्र ने उसके ऊपर वज्र फेंका. मेघ से ढका हुआ वृत्र इंद्र की ओर दौड़ा तभी तीखे आयुध वाले इंद्र ने उसे हरा दिया. (३) बृहस्पते तपुषाश्वेव विध्य वृकद्द्वरसो असुरस्य वीरान्. यथा जघन्थ धृषता पुरा चिदेवा जहि शत्रुमस्माकमिन्द्र.. (४) हे बृहस्पति! वज्र के समान संतापकारी एवं अस्त्र के द्वारा बंद करने वाले असुर के पुत्रों का नाश करो. हे इंद्र! तुमने प्राचीनकाल में हमारे शत्रुओं को जिस प्रकार नष्ट किया था, उसी प्रकार इस समय शत्रुओं का नाश करो. (४) अव क्षिप दिवो अश्मानमुच्चा येन शत्रुं मन्दसानो निजूर्वाः. तोकस्य सातौ तनयस्य भूरेरस्माँ अर्धं कृणुतादिन्द्र गोनाम्.. (५) हे ऊपर निवास करने वाले इंद्र! तुमने स्तोताओं की स्तुतियां सुनकर आकाश से भी पाषाण तुल्य कठिन वज्र फेंककर शत्रु को नष्ट किया था, उसी वज्र को नीचे की ओर फेंको.