सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Samaveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextमा न इन्द्र पीयत्नवे मा शर्धते परा दाः. शिक्षा शचीवः शचीभिः.. (६) हे इंद्र! आप हमें दुष्टों और अपमान करने वालों के भरोसे मत छोड़िए. आप पवित्र शिक्षा के द्वारा शची की तरह पवित्र धन प्रदान कीजिए. (६) एन्द्र याहि हरिभिरुप कण्वस्य सुष्टुतिम्. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (७) हे इंद्र! आप घोड़ों के द्वारा पधारिए. आप कण्व की स्तुति सुनिए. हे स्वर्गलोकवासी! हम आप के राज में सुखी हैं. (७) अत्रा वि नेमिरेषामुरां न धूनुते वृकः. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (८) हे इंद्र! सोम को कूटने वाले पत्थर भी मानो बोलते हुए आप को बुला रहे हैं. हे स्वर्गलोकवासी! हम आप के राज में सुखी हैं. (८) आ त्वा ग्रावा वदन्निह सोमी घोषेण वक्षतु. दिवो अमुष्य शासतो दिवं यय दिवावसो.. (९) हे सोम! कूटने वाला पत्थर आवाज करता हुआ सोमरस निकाल रहा है. उस से निकलने वाली सोम की धारा वैसे ही कांप रही है, जैसे भेड़िए के डर से भेड़ कांपती है. हम स्वर्गलोकवासी इंद्र के राज में सुखी हैं. आप पधारिए. (९) पवस्व सोम मन्दयन्निन्द्राय मधुमत्तमः.. (१०) हे सोम! आप पवित्र हैं. आप मदमाते हुए इंद्र के लिए श्रेष्ठ रस झरने की कृपा कीजिए. (१०) ते सुतासो विपश्चितः शुक्रा वायुमसृक्षत.. (११) हे सोम! आप प्रकाशमान व बुद्धिवर्द्धक हैं. आप को वायु देव के लिए परिष्कृत किया जाता है. (११) असृग्रं देववीतये वाजयन्तो रथा इव.. (१२) हे सोम! आप को अन्न धन के इच्छुक यजमान ऐसे तैयार करते हैं, जैसे रथ को तैयार किया जाता है. (१२) पांचवां खंड अग्नि ॡ होतारं मन्ये दास्वन्तं वसोः सूनु ॡ सहसो जातवेदसं विप्रं न जातवेदसम्. य ऊर्ध्वया स्वध्वरो देवो देवाच्या कृपा. ebook converter DEMO Watermarks*