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सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

सामवेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Samaveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished310 pages

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को घने अंधकार से घेर लीजिए, जिस से वे एकदूसरे को पहचान तक न सकें और अपनी ही सेना का संहार कर दें. (१२) अमीषां चित्तं प्रतिलोभयन्ती गृहाणाङ्गान्वप्वे परेहि. अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकेरन्धेनामित्रामस्तमसा सचन्ताम्.. (१३) हे पाप के देवता! आप शत्रुओं के चित्त प्रति लोभी बनाइए. आप शत्रुओं के अंगों को भी कस लीजिए. आप शोकों की ज्वालाओं से शत्रुओं का हृदय दहलाइए. आप घनघोर अंधेरा कर के शत्रु को अचेत (बेहोश) बना दीजिए. (१३) प्रेता जयता नर इन्द्रो वः शर्म यच्छतु. उग्रा वः सन्तु बाहवो ऽ नाधृष्या यथासथ.. (१४) हे वीर मनुष्यो! इंद्र आप को सुखशांतिमय बनाने की कृपा करें. आप के बाहु उग्र हों. आप को शत्रु अधीन न बना सके. आप उन पर आक्रमण कर के विजय प्राप्त कीजिए. (१४) अवसृष्टा परा पत शरव्ये ब्रह्मसं ꣪ शिते. गच्छामित्रान्प्र पद्यस्व मामीषां कं च नोच्छिषः.. (१५) हमारे बाण वेदमंत्रों और स्तुतियों से प्रेरित किए गए हैं. वे बाण जब हम छोड़ें तो शत्रु कितना ही दूर क्यों न हो, उस पर जा कर गिरें. उन शत्रुओं में से कोई भी बच न पाए. (१५) कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त्वेनान् गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना. मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वया ꣪ श्येनाननुसंयन्तु सर्वान्.. (१६) हे इंद्र! बाण मांसाहारी बाज की तरह शत्रुओं का अनुगमन (पीछा) करें. शत्रुओं की सेना गिद्धों का भोजन हो जाए. उन का कोई अवशेष न रह पाए. पाप में लगे पापी भी बच न पाएं. मांसाहारी पक्षी उन का भी अनुगमन (पीछा) करें. (१६) अमित्रसेनां मघवन्न्रस्मां छत्रयतीमभि. उभौ तामिन्द्र वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति.. (१७) हे इंद्र! आप अमित्रों की सेना का नाश कीजिए. आप वृत्रहंता व धनवान हैं. आप और अग्नि मिल कर शत्रुओं की सेना को भस्म करने की कृपा करें. (१७) यत्र बाणाः संपतन्ति कुमारु विशिखा इव. तत्र नो ब्रह्मणस्पतिरदितिः शर्म यच्छतु विश्वाहा शर्म यच्छतु.. (१८) जहां बाण इस तरह गिरते हैं, जैसे बिना चोटी वाले चंचल बालक गिर रहे हों, वहां अदिति और ब्रह्मणस्पति हमें सुख देने की कृपा करें. वे सदैव हमारा कल्याण करने की कृपा करें. (१८) वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज. वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः.. (१९) ebook converter DEMO Watermarks*