साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in context१२ श्रीसाम्बपुराणम्
यौवनयुक्त साम्ब का रूप चराचर में अतुलनीय है। इसलिये सभी स्त्रीगण उसे देखने की इच्छा करती हैं, यहाँ तक कि आपकी पत्नियाँ भी॥१८-१९॥
वशिष्ठ उवाच
श्रुत्वैतन्नारदाद्वाक्यं भाविनाऽर्थेन मोहितः।
अविचार्र्यैव तत् सर्वं देवः प्रोवाच नारदम्॥२०॥
वशिष्ठ कहते हैं—नारद की यह बात सुनकर भवितव्यता के कारण ही वासुदेव ने विना कोई विचार किये नारद से इस प्रकार कहा॥२०॥
वासुदेव उवाच
न ह्यहं श्रद्दधाम्येवं यदेतद् व्याहृतं त्वया।
ब्रुवाणमेवं देवं तु नारदः प्रत्युवाच ह॥२१॥
वासुदेव ने कहा—(हे नारद!) आपने जो कुछ कहा, उसका मैं तनिक भी विश्वास नहीं करता। वासुदेव का यह उत्तर सुनकर नारद ने प्रत्युत्तर दिया—मैं वैसा करूँगा, जिससे आपको विश्वास हो॥२१॥
वशिष्ठ उवाच
एवमुक्त्वा ययौ भूत्वा नारदस्तु यथागतः।
ततः कतिपये चाह्नि द्वारकां पुनरभ्यगात्॥२३॥
तस्मिन्नहनि देवोऽपि सहान्तःपूरिकाजनैः।
अनुभूय जलक्रीड़ा यानमासेवते रहः॥२४॥
ऋषि वशिष्ठ देव कहते हैं—ऐसा कहकर नारद यथाभिलषित देश को चले गये। तदनन्तर कुछ दिनों के उपरान्त पुनः द्वारिका आये। उस दिन श्रीकृष्ण भी अन्तःपुर की रमणियों के साथ जलक्रीड़ा करके निर्जन में अवस्थित थे॥२३-२४॥
रम्ये रैवतकोद्याने हर्म्यमालोपशोभिते।
सर्वर्तुकुसुमैर्नित्यं वासिते चित्रकानने॥२५॥
नृत्यद्भिर्बर्हिभिर्नित्यं केकाशतनिनादिते।
कोकिलारावसंघुष्टे चक्रवाकोपशोभिते॥२६॥
रैवतक (द्वारका के निकट पर्वत) के रम्य उद्यान में अट्टालिकावली शोभित थी। वह सभी ऋतुओं के पुष्पों द्वारा नित्य आमोदित थी। वह विचित्र कानन नित्य नृत्यरत मयूर तथा १००-१०० केका के शब्द से गूंजा करता था। वह कोकिल के शब्द से शब्दित तथा चक्रवाक पक्षियों द्वारा उपशोभित था॥२५-२६॥
कोकिलामधुरालापे जलकुक्कुटनादिते।
षट्पदोद्गीतमधुरे शुकचातकनादिते॥२७॥