BharatKosha
साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)

Samba Purana Hindi

by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)

Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)

DevanagariHindipublished424 pages

Page 21 of 424

Read in context
Page 21

तृतीयोऽध्यायः ११

पितृलोक, राक्षस लोक, नागलोक, यमलोक, वरुणलोक, इन्द्र की अमरावती तथा कुबेर की पुरी में एवं पृथ्वी पर जितने राजागण हैं, जो पाताल में हैं, उन सभी के स्थान पर इनकी बाधाहीन अप्रतिहत गति है।।११-१२।।

वासुदेवं स वै द्रष्टुं नीत्वा द्वारावतीं पुरीम्।
आयान्तं ऋषिभिः सार्द्धं क्रोधनो मुनिसत्तमः ॥१३॥

एक बार वह नारद कोपन स्वभाव ऋषियों के साथ वासुदेव का दर्शन करने के लिये द्वारिकापुरी आये।।१३।।

अथात्रागच्छतस्तस्य सर्वे यदुकुमारकाः।
प्रद्युम्नप्रमुखा ये ते प्रह्वेनावनताः स्थिताः ॥१४॥
अभिवाद्यार्घ्यपाद्यैश्च पूजां कुर्वन्ति यत्नतः।
साम्बस्त्ववश्यम्भावित्वात्तस्य शापस्य मोहितः ॥१५॥

तदनन्तर प्रद्युम्न आदि सभी प्रमुख यदुकुमारगण ने वहाँ आकर तथा सविनय अवनत होकर अभिनन्दन-पाद्य-अर्घ्य प्रभृति द्वारा यत्नपूर्वक उनका पूजन किया। अवश्यम्भावी के कारण साम्ब उस शाप से मोहित हो गया।।१४-१५।।

अवज्ञां कुरुते नित्यं नारदस्य महात्मनः।
ततः क्रीडासु सततं रूपयौवनगर्वितः ॥१६॥
अविनीतं सुतं ज्ञात्वा चिन्तयामास नारदः।
अस्याहमविनीतस्य करिष्ये विनयं भृशम् ॥१७॥

साम्ब अपने रूप एवं यौवन से गर्वित होकर सतत् क्रीड़ा में मत्त रहता था और सर्वदा महात्मा नारद की अवज्ञा किया करता था। इस वासुदेवपुत्र को अविनीत देखकर नारद चिन्तित हो गये और विचार किया कि इस अविनीत को मैं अच्छी तरह संयत करूँगा।।१६-१७।।

एवं सञ्चिन्तयित्वा तु वासुदेवं ततोऽब्रवीत्।
इमाः षोडशसाहस्र्यः पत्न्यो देवस्य यास्तव।
सर्वासां च मनांस्यासां साम्बेन किल केशव ॥१८॥
हृतानि पुण्डरीकाक्ष रूपयौवनशालिना।
रूपेणाप्रतिमः साम्बो लोकेऽस्मिन् सचराचरे।
अतो हीच्छन्ति तास्तस्य दर्शनं ह्यपि ते प्रियः ॥१९॥

ऐसा विचार करके नारद ने वासुदेव से कहा—हे केशव! आपकी जो १६००० पत्नियाँ हैं, उन सबका मन साम्ब ने अपहृत कर लिया है। हे पुण्डरीकाक्ष! रूप-