साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१० श्रीसाम्बपुराणम्
बृहद्वल पूछते हैं—यह साम्ब कौन है? कहाँ से आये अर्थात् कहाँ रहते थे? किसके पुत्र हैं, जो रवि को प्रिय हैं तथा सहस्र किरणयुक्त सूर्य ने जिन्हें घर प्रदान किया है?॥५॥
वशिष्ठ उवाच
अदितेर्द्वादशपुत्रो विष्णुर्यः स पुनस्त्विह।
वासुदेवत्वमापन्नस्तस्य साम्बोऽभवत् सुतः ॥६॥
स तु पित्रा भृशं शप्त्वा कुष्ठरोगमवाप्तवान्।
तेनायं स्थापितः सूर्यः स्वनाम्ना च पुरः कृतः ॥७॥
वशिष्ठ कहते हैं—देवमाता अदिति के बारहवें पुत्र जो विष्णु हैं, वे ही वसुदेव के पुत्ररूप से अवस्थित हैं (वासुदेव हैं)। उनके ही पुत्र हैं—साम्ब।
किन्तु पिता से भीषण अभिशाप पाकर उन्हें कुष्ठ रोग हो गया था। उन्होंने ही इन सूर्य की स्थापना (चन्द्रभागा के तट पर) की और अपने नाम से पुरी का भी निर्माण कराया॥६-७॥
बृहद्वल उवाच
शप्तः कस्मिन्निमित्तोऽसौ पित्रा पुत्रः स्वसम्भवः।
भाव्यं हि कारणेनात्र येनासौ शप्तवान् सुतम् ॥८॥
बृहद्वल पूछते हैं—पिता द्वारा उनके ही आत्मज (पुत्र) क्यों अभिशप्त हुये? अवश्य ही इसमें कोई विशेष कारण है, जिस कारण से पिता ने अपने पुत्र को ही शाप दिया॥८॥
वशिष्ठ उवाच
शृणुष्वावहितो राजंस्तस्य तच्छापकारणम्।
ब्रह्मणो मानसः पुत्रो नारदो नाम यो मुनिः ॥९॥
ब्रह्मलोके मुनेस्तस्य विष्णुलोके तथैव च।
सूर्यलोके च सततं रुद्रलोके तथैव च ॥१०॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—हे राजन्! तुम सावधान होकर सुनो। उनके शाप का कारण कहता हूँ। ब्रह्मा के मानसपुत्र नारद नामक मुनि हैं। इनकी ब्रह्मलोक, विष्णुलोक, सूर्यलोक तथा रुद्रलोक में अप्रतिहत गति है॥९-१०॥
पितृराक्षसनागानां यमस्य वरुणस्य च।
इन्द्रस्य चामरावत्यां पुर्यां तु धनदस्य च ॥११॥
पृथिव्यां पार्थिवाद्यां ये ये पातालसमुद्भवाः।
सदा वेश्मसु तेषां च तस्याप्रतिहतां गतिः ॥१२॥