साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल) द्वारा
स्रोत: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृतीयोऽध्यायः
(साम्बशापः)
बृहद्वल उवाच
आद्यं स्थानं रवेः कुत्र कस्मिन् द्वीपे महामुने ।
यत्र पूजां विधानोक्तां प्रतिगृह्णात्यसौ स्वयम् ॥१॥
साम्ब को शाप—बृहद्वल पूछते हैं—हे महामुने! रवि का प्रथम पूजास्थान कहाँ है, जहाँ वे प्रथम बार पूजित हुये हैं। किस द्वीप में वे स्वयं यथाविधि की गई पूजा को ग्रहण करते हैं॥१॥
वशिष्ठ उवाच
चन्द्रभागातटे रम्ये पुरं यत् साम्बसंज्ञितम् ।
भूर्लोके शाश्वतं स्थानं तत्र सूर्यस्य नित्यता ॥२॥
प्रीत्या साम्बस्य तत्रार्को जगतोऽनुग्रहाय च ।
स्थितो द्वादशभोगेन मित्रो मैत्रेण चक्षुषा ॥३॥
वशिष्ठ मुनि कहते हैं—पृथ्वी पर चन्द्रभागा नदी के तट पर साम्ब नामक एक पुरी है। वह शाश्वत स्थान है, जहाँ सूर्य की नित्यता है (नित्य विद्यमानता है)। वहाँ सूर्य साम्ब से प्रीति के कारण तथा जगत् पर अनुग्रहार्थ बन्धु के समान दृष्टि के साथ द्वादश भाग में विराजित हैं॥२-३॥
विशेष—चन्द्रभाग हिमालय का एक अंश है। वहाँ से उत्पन्न नदी है—चन्द्रभागा नामक काश्मीर देशीय नदी। यहाँ स्नान करके चन्द्र दक्षशाप से मुक्त हो गये थे। वर्तमान में इसे चेनाब नदी कहते हैं। वेदों में यही असिक्णी नदी कही गई है।
तत्र भक्तिमतः सर्वाननुगृह्णाति भास्करः ।
विधिप्रयुक्तां पूजां च गृह्णाति भगवान् स्वयम् ॥४॥
वहाँ भगवान् भास्कर सभी भक्तों पर अनुग्रह करते हैं और विधि से प्रयुक्त पूजन को स्वयं ग्रहण करते हैं॥४॥
बृहद्वल उवाच
कोऽयं साम्बः कुतः कस्य पुत्रो नाम्ना रवेः प्रियः ।
यस्य चायं सहस्त्रांशुर्वरदः पुण्यकर्मणः ॥५॥