साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in contextषष्ठोऽध्यायः
( भक्त्युपस्थानम्)
बृहद्वल उवाच
कथं साम्बः प्रपन्नोऽर्कं केन वा प्रतिपादितः।
उग्रं शापं च सम्प्राप्य पितरं स किमुक्तवान् ॥१॥
बृहद्वल कहते हैं—साम्ब किसलिये सूर्य के शरणापन्न हुये? वह कैसे सम्पन्न हुआ तथा उग्र शाप पाकर उन्होंने पिता से क्या कहा।।१।।
वशिष्ठ उवाच
ततः शापाभिभूतश्च साम्बः पितरमब्रवीत्।
किं मयापकृतं देव येन शप्तो ह्यहं त्वया ॥२॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—तदनन्तर साम्ब शाप से अभिभूत होकर पिता से बोले—हे देव! मैंने क्या अपराध किया था, जो आपके शाप द्वारा मैं अभिशप्त हो गया?।।२।।
अहं त्वदाज्ञया देव त्वरमाण इहागतः।
कथं निपातितः शापो मयि तेऽनपकारिणी ॥३॥
मैंने तो आपका कोई अपराध नहीं किया था। आप की आज्ञा पाकर ही यहाँ आया था। आप प्रसन्न हो जायँ। हे देवेश! शाप लौटा लीजिये। हे प्रभु! आप मुझ पर प्रसन्न होईये।।३।।
न तेऽपकुर्मेऽहं किञ्चित् प्रसीद जगतः पते।
शापं नियच्छ देवेश प्रसादं कुरु मे प्रभो ॥४॥
मैंने आपका कोई अपराध नहीं किया है। हे जगत् के पति! आप प्रसन्न हो जाईये। शाप लौटा लीजिये। प्रसन्न हो जाईये।।४।।
तमुवाच ततः कृष्णः साम्बं बुद्ध्वा ह्यनागसम् ॥५॥
तस्मात्त्वमेव पृच्छस्व प्रसाद्य ऋषिसत्तमम्।
आख्यास्यति स ते देवः शापं यस्ते विनेष्यति ॥६॥
तदनन्तर कृष्ण ने बुद्धि द्वारा साम्ब को निरपराध जानकर उससे कहा—तुम ऋषि-श्रेष्ठ (नारद) को प्रसन्न करके पूछो। वे ही तुमको बतायेंगे कि कौन देवता इस शाप का अपनोदन कर सकते हैं।।५-६।।