साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in context२८ श्रीसाम्बपुराणम्
अथैतत् स पितुर्वाक्यं श्रुत्वा जाम्बवतीसुतः ।
दीनः शापपरीताङ्गस्ततः सञ्चिन्त्य वै पुनः ॥७॥
द्वारवत्यां स्थितं विष्णुं कदाचिद्द्रष्टुमागतम् ।
विनयादुपसङ्गम्य साम्बः पप्रच्छ नारदम् ॥८॥
अब जाम्बवती-पुत्र साम्ब पिता का वाक्य सुनकर और अतिदीन भाव से कुष्ठ रोगाक्रान्त होकर रहने लगे। तदनन्तर एक बार द्वारका में विष्णुदर्शनार्थ आये नारद के पास जाकर सविनय जिज्ञासा करने लगे।।७-८।।
साम्ब उवाच
भगवन् ब्रह्मणः पुत्र सर्वज्ञः सर्वलोकगः ।
दयां हि कुरु विप्रेन्द्र प्रणतस्य ममानघ ॥९॥
त्वत्तोऽहं श्रोतुमिच्छामि निश्चयं ब्रूहि तन्मम ।
कः स्तुत्यः सर्वदेवानां कः परः पुरुषोऽव्ययः ॥१०॥
दीनस्यार्तिहरः कश्च शरणं कं व्रजाम्यहम् ।
पितृशापसमुत्थेन कश्मलेन महामुने ॥११॥
अतिभूतस्य मोक्षो मे किं प्रपन्नस्य वै भवेत् ।
साम्ब कहते हैं—हे भगवन् ब्रह्मपुत्र, सर्वज्ञ, सर्वलोक-गमनकारी, विप्रेन्द्र, निष्पाप! मैं प्रणत हूँ, मुझ पर दया करिये। मैं आपसे जो सुनना चाहता हूँ, वह आप अवश्य कहिये। सभी देवताओं में कौन स्तुत्य है? कौन अव्यय पुरुष है? कौन दीनों का हितकारी है? हे महामुने! पिता द्वारा शापोद्भूत पाप के क्षालनार्थ मैं किसकी शरण ग्रहण करूँ?।।९-११।।
वशिष्ठ उवाच
एवं सम्पृच्छते तस्मै साम्बायोवाच नारदः ॥१२॥
ऋषि वशिष्ठदेव कहते हैं—इस प्रकार का प्रश्न पूछने पर नारद ने साम्ब से कहा।।१२।।
नारद उवाच
कदाचित् पर्यटँल्लोकान् सूर्यलोकमहं गतः ।
तत्र दृष्ट्वा मया सूर्यः सर्वदेवगणैर्वृतः ॥१३॥
गन्धर्वैरप्सरोभिश्च नागैर्यक्षैः सराक्षसैः ।
गायन्ति तत्र गन्धर्वा नृत्यन्तोऽप्सरसस्तथा ॥१४॥
रक्षन्त्युद्यतशस्त्रास्त्रा यक्षराक्षसपन्नगाः ।
ऋचो यजूंषि सामानि मूर्तिमन्ति हि तत्र च ॥१५॥