साम्ब पुराण (श्री एस. एन. खण्डेलवाल हिन्दी व्याख्या सहित)
Samba Purana Hindi
by महर्षि वेदव्यास (व्याख्याकार: श्री एस. एन. खण्डेलवाल)
Source: Sri Samba Purana with Hindi Commentary by Sri S. N. Khandelwal (origin)
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Read in contextषष्ठोऽध्यायः <span style="float: right;">२९</span>
नारद कहते हैं—किसी समय मैं नाना स्थानों में पर्यटन करते-करते सूर्यलोक में गया था। वहाँ देखा कि देवता, गन्धर्व, अप्सरा, नाग, यक्ष, राक्षस सभी सूर्यदेव को घेरे हुए हैं। वहाँ गन्धर्वगण गायन कर रहे थे तथा अप्सरायें नृत्य कर रहीं थी। यक्ष, राक्षस तथा सर्पगण उद्यत शस्त्र-अस्त्र द्वारा सूर्यदेव की रक्षा कर रहे थे एवं ऋक्, यजुः तथा सामवेद मूर्त्तिमान होकर वहाँ विराजित थे॥१३-१५॥
तत्कृतैर्विविधैः स्तोत्रैः स्तुवन्ति ऋषयो रविम्।
मूर्त्तिमन्तः शुभास्तत्र तिस्रः सन्ध्याः शुभाननाः॥१६॥
ऋषिगण ऋक् आदि स्तोत्रों से उनकी स्तुति का गायन कर रहे थे। मंगलमयी शुभानना प्रातः, मध्याह्न तथा सायं सन्ध्या मूर्त्ति धारण करके वहाँ स्थित थीं॥१६॥
गृहीतैर्वज्रनाराचैः परिचर्य रविं स्थिताः।
आदित्या वसवो रुद्रा मरुतश्चाश्विनौ तथा॥१७॥
वज्र, नाराच प्रभृति अस्त्र धारण किये अदिति के पुत्रगण, वसुगण, मरुद्गण तथा अश्विनीकुमारद्वय वहाँ सूर्य की परिचर्या करते हुये विद्यमान थे॥१७॥
त्रिसन्ध्यं पूजयत्यर्कं तत्रान्यं च दिवौकसः।
ईरयन् जयशब्दं तु शक्रस्तत्रैव तिष्ठति॥१८॥
वहाँ तीनों सन्ध्या में सूर्य का पूजन हो रहा था तथा जय-जयकार शब्द का उद्घोष करते हुये इन्द्र भी वहाँ उपस्थित थे॥१८॥
ब्रह्मा विष्णुश्च रुद्रश्च प्रयुञ्जन्त्याशिषः शुभाः।
रथं हि वाहते तस्य अरुणो नाम सारथिः॥१९॥
हरितैः सप्तभिर्युक्तं छन्दोभिर्वाजिरूपिभिः।
द्वे भार्ये पार्श्वयोस्तस्य ते राज्ञीनिक्षुभे शुभे॥२०॥
ब्रह्मा-विष्णु तथा रुद्र शुभाशीष दे रहे थे। अरुण नामक सूर्य का सारथी सप्तवर्ण अश्वरूप छन्दों से युक्त रथ चला रहा था। उसके दोनों पार्श्व में दो भार्या मंगलमयी राज्ञी तथा निक्षुभा बैठीं थी॥१९-२०॥
अन्यैश्च नामभिर्देवाः परिचर्यविधिं स्थिताः।
पिङ्गलो देवकस्तत्र ततोऽन्यो दण्डनायकः॥२१॥
राज्ञस्तोषौ च तद्द्वारे ततः कल्माषपक्षिणौ।
ततो व्योमचतुःशृङ्गं मेरोः सदृशलक्षणम्॥२२॥