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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

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भूमिका “हिन्दोसांख्य” लिये इसके सांख्य के छः (६) दर्शनों में सांख्य दर्शन सब से प्राचीन और गिना जाता है। इस दर्शन के आविष्कार के कर्त्ता महा- मुनि कपिलदेव जी हुवे हैं, जो भगवान् के २४ अवतारों में से अन्यतम अवतार हैं। “पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्वग्रामविनिर्णयम् ॥” [ श्री० भा० १, ३, १० ] अर्थात्-५ वां कपिल नाम सिद्धेश्वर अवतार हुआ, जिसने काल से विलुप्त सांख्य शास्त्र को,-जिस में तत्वों के समूह का निर्णय किया गया है, आसुरि नाम अपने शिष्य को पढ़ाया। इस वाक्य के “कालविप्लुतम्” इस पद से यह भी निर्णय होता है, कि कपिल देव से पहिले भी सांख्य शास्त्र था, किन्तु वह काल से विलुप्त हो गया था। तथा यह भी कि आप का प्रथम शिष्य आंसुरि हुआ। भगवान् कपिल देव सांख्य शास्त्र के आविष्कार या पुनरुद्धार करने वाले, स्वायंभुव मनु के दौहित्र और कर्दम महर्षि के पुत्र थे। स्वायंभुव मनु १४ मनुओं में आद्य मनु थे,- “स्वायंभुवो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥” ( रघुवं० १, ) उन्हों ने अपनी कन्या देवहूति नाम की कर्दम ऋषि से विवाही थी। स्वायंभुव मनु ब्रह्मावर्त्त देश में बाहिष्मती नाम नगरी में रहते थे, और सप्तद्वीपा पृथिवी के सम्राट् थे। कर्दम