सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
पण्डित सीताराम शास्त्रि सम्पादित
हिन्दी-सांख्यदर्शन मूलग्रन्थ सहित श्रीहरियाणा-शेखावाटी ब्रह्मचर्याश्रमाध्यक्ष- पण्डित सीताराम शास्त्रि सम्पादित HINDI SANKHYADARSHANA. EDITED AND ANNOTATED VIDYAMARTANDA Principal, Shrehariana shekhawati Brahmacharyashram Printed by P. Magni Rama S. Dhrama Press Meerut.
भूमिका “हिन्दोसांख्य” लिये इसके सांख्य के छः (६) दर्शनों में सांख्य दर्शन सब से प्राचीन और गिना जाता है। इस दर्शन के आविष्कार के कर्त्ता महा- मुनि कपिलदेव जी हुवे हैं, जो भगवान् के २४ अवतारों में से अन्यतम अवतार हैं। “पञ्चमः कपिलो नाम सिद्धेशः कालविप्लुतम् । प्रोवाचासुरये सांख्यं तत्वग्रामविनिर्णयम् ॥” [ श्री० भा० १, ३, १० ] अर्थात्-५ वां कपिल नाम सिद्धेश्वर अवतार हुआ, जिसने काल से विलुप्त सांख्य शास्त्र को,-जिस में तत्वों के समूह का निर्णय किया गया है, आसुरि नाम अपने शिष्य को पढ़ाया। इस वाक्य के “कालविप्लुतम्” इस पद से यह भी निर्णय होता है, कि कपिल देव से पहिले भी सांख्य शास्त्र था, किन्तु वह काल से विलुप्त हो गया था। तथा यह भी कि आप का प्रथम शिष्य आंसुरि हुआ। भगवान् कपिल देव सांख्य शास्त्र के आविष्कार या पुनरुद्धार करने वाले, स्वायंभुव मनु के दौहित्र और कर्दम महर्षि के पुत्र थे। स्वायंभुव मनु १४ मनुओं में आद्य मनु थे,- “स्वायंभुवो मनुर्नाम माननीयो मनीषिणाम् । आसीन्महीक्षितामाद्यः प्रणवश्छन्दसामिव ॥” ( रघुवं० १, ) उन्हों ने अपनी कन्या देवहूति नाम की कर्दम ऋषि से विवाही थी। स्वायंभुव मनु ब्रह्मावर्त्त देश में बाहिष्मती नाम नगरी में रहते थे, और सप्तद्वीपा पृथिवी के सम्राट् थे। कर्दम
( २ ) महर्षि सरस्वती नदी के तीर पर बिन्दुसर थे । उक्त मनु ने अपने स्थान से अपनी महारा के साथ अपनी उक्त कन्या को रथ में बिठा कर व के स्थान में ) जाकर ब्राह्म-विवाह-विधि से, जो सब । में प्रथम ( उत्तम ) कहा गया है, उस के साथ व्याह दी फिर समय पाकर कर्दम के वीर्य से देवहूति में ६ कन्याएं हुईं । पुनः देवहूति के प्रार्थनानुसार बहुत काल के पश्चात् भगवान् के अंश से कपिल नाम पुत्र हुआ । “तस्यां बहुतिथेकाले भगवान्मधुसूदनः । कार्दमं वीर्यमापन्नो जज्ञेऽग्निरिवदारुणि ॥” ( श्री० भा० ३, २४, ६ ) इस उपर्युक्त इतिहास के अनुसार कपिलदेव ब्राह्ममहा- कल्प के आरम्भ में हुये और उसी समय इस सांख्य शास्त्र का पुनरुद्भव ( पुनर्जन्म ) हुआ । इसी प्रकार यह शास्त्र कपिलदेव से आसुरि को, उससे पञ्चशिख को और उस से शिष्यपरम्परा के द्वारा ईश्वरकृष्ण को प्राप्त हुआ, तथा उन्हों- ने उस सांख्य को प्रचलित कारिकाओं में, जो “दुःखत्रयाभि- घातात्,, इस कारिका से आरम्भ होकर “परवादविवर्जि- ताश्चापि,, इस कारिका पर समाप्त होती हैं, लिखा । “एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पया प्रददौ । आसुरिरपि पञ्चशिखाय तेनच बहुधाकृतं तन्त्रम् ॥ शिष्यपरम्परागतमीश्वरकृष्णेन चैतदार्याभिः । संक्षिप्तमार्यमतिना सम्यग्विज्ञाय सिद्धान्तम् ॥ ( सां० का० ७०-७१ ) इसी ईश्वरकृष्णीय सांख्य के आधार पर यह हमारा
( ३ ) "हिन्दीसांख्य" है। पाठकों के सुखपूर्वक शास्त्र में प्रवेश के लिये इसके आरम्भ में चित्रावली लगाई है, जिस के द्वारा सांख्य के तत्वों को पाठक संक्षेप से अनायास समझ सकेंगे, और फिर ग्रन्थ के पड़ने में भी उन्हें बहुत सुविधा होगी। ग्रन्थ के भीतर जिस कारिका (श्लोक) का अर्थ आरम्भ होता है, वहां पर भी सुख बोध के लिये विषयबोधक शीर्षक, उस के नीचे कारिका और उस के नीचे उसी की व्याख्या है। कहीं२ ग्रन्थ के भीतर भी समझाने के लिये चित्र लगाये गये हैं। विषय के क्लिष्ट होने के कारण जहां सरलता नहीं हो सकी है, उस के लिये विद्वानों से क्षमा प्रार्थनापूर्वक निवेदन है, कि- वे उस की सूचना देवें, जिससे कि- वह सुधार दूसरी आवृत्ति में कर दिया जावे। भागवत सांख्य और यह सांख्य भागवत पुराण के सांख्य में भी प्राकृतिक तत्व २४ ही हैं "पञ्चभिः पञ्चभिर्ब्रह्मन् चतुर्भिर्दशभिस्तथा । एतच्चतुर्विंशतिकं गणं प्राधानिकं विदुः" ( श्री० भा० ३, २६; ११ ) अर्थात्- ५ महाभूत (पृथिवी, जल, अग्नि, वायु, आका- श) ५ तन्मात्र (गन्ध, रस, रूप, स्पर्श शब्द) ४ अन्तः करण (मन, बुद्धि, अहंकार, चित्त) ५ ज्ञानेन्द्रियें (श्रोत्र, त्वचा, दृक्, रसन, नासिका) ५ कर्मेन्द्रियें (वाणी, कर, चरण, लिङ्ग, गुद) यह प्रधान या प्रकृति का गण है। ईश्वरकृष्णीय सांख्य में २५ वां तत्व पुरुष को बताया गया है, उसके स्थान में भागवत में काल तत्व कहा है। "एतावानेव संख्यातो ब्रह्मणः सगुणस्य ह ।, संनिवेशो मया प्रोक्तो यः कालः पञ्चविंशकः" ॥ ( श्री० भा० ३, २६, १५ )
( ४ ) इस काल तत्व के संबन्ध में दो मत हैं । (१) कोई वि- द्वान् मानते हैं कि-यह पुरुष का ही प्रभाव है, जिससे अज्ञा- नी मनुष्य को भय होता है । (२) दूसरा सिद्धान्त मत यह है कि यह भगवान् ही काल रूप से प्रतीत होता है, जिस के सम्बन्ध से गुणों के साम्यरूप प्रधान (जड़) में भी चेष्टा हो जाती है, तथा वही भगवान् शरीरों के भीतर पुरुष रूप से है, और बाहर से वही कालरूप प्रतीत होता है । "प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतोभयम् । अहंकारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः" ॥ "प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि ! चेष्टा यतः स भगवान् कालइत्युपलक्षितः ॥" "अन्तःपुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः । समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥" ( श्री० भा० ३, २६, १८ ) ईश्वरकृष्णीय सांख्य निरीश्वरवादी और भागवतसांख्य ईश्वरवादी है-यही इन दोनों का मतभेद है, कोई कहते हैं पूर्व सांख्य का प्रकृति और पुरुष के विवेक में ही तात्पर्य है, किन्तु ईश्वर के खण्डन में नहीं, इसी से उतने को ही दिखाया है, यह ठीक भी है । क्योंकि-वैदिक पुरुष का निरी- श्वरवादी होना असंभव है । समर्पणम् "येन शुक्लेन महता सर्वं शुक्लीकृतं जगत् । विद्यया मुनये तस्मै कृतिर्मेऽस्तुसमर्पणम् ॥" कार्तिक शुक्ला १५ ⎬ विद्वद्वशंवद- सं० १६७३ वि० ⎭ सीतारामशर्मा
हिन्दी-सांख्य दर्शन ( सांख्य-पदार्थ ) —>:०:-<— ( १ ) तत्वों का संक्षेप—(१) प्रकृति ( २ पुरुष ) व्याख्या- (क) (१) अव्यक्त (२) व्यक्त (३) पुरुष । (ख) (१) प्रकृति (२) महत्तत्व (३) अहंकार (४) मन (५) चक्षुः (६) श्रोत्र (७) घ्राण (८) रसन (६) त्वक् (१०) वाक् (११) हस्त (१२) पाद् (१३) उपस्थ (१४) गुद (१५) शब्द (१६) स्पर्श (१७) रूप (१८) रस (१६) गन्ध (२०) आकाश (२१) वायु (२२) तेज (२३) जल (२४) पृथ्वी (२५) पुरुष । ( २ ) करण-(१) महत्तत्व (बुद्धि) (२) अहंकार (अभिमान) (३) मन (४) चक्षुः ( नेत्र ) ( ५ ) श्रोत्र ( कान ) ( ६ ) घ्राण ( नांक ) ( ७ ) रसन ( जिह्वा ) ( ८ ). त्वक् ( चर्म ) ( ६ ) वाक् ( वाणी ) ( १० ) पाणि ( हाथ ) ( ११ ) पाद् ( पैर ) ( १२ ) पायु ( गुदा ) ( १३ ) उपस्थ ( लिङ्ग या योनि ) । ( ३ ) अन्तःकरणत्रय-( १ ) बुद्धि ( २ ) अहंकार ( ३ ) मन ।
पाणि ( ६ ) पाद ( १० ) पायु ( ११ ) उपस्थ ।
( २ ) ( ४ ) इन्द्रियें--( १ ) मन ( २ ) चक्षुः ( ३ ) श्रोत्र ( ४ ) घ्राण ( ५ ) रसन ( ६ ) त्वक् ( ७ ) वाक् ( ८ ) पाणि ( ६ ) पाद ( १० ) पायु ( ११ ) उपस्थ । ( ५ ) ज्ञानेन्द्रियें--( १ ) चक्षुः ( २ ) श्रोत्र ( ३ ) घ्राण ( ४ ) रसन ( ५ ) त्वक् । ( ६ ) कर्मेन्द्रियें--( १ ) वाक् ( २ ) पाणि ( ३ ) पाद ( ४ ) पायु ( ५ ) उपस्थ । ( ७ ) ज्ञानकर्मेन्द्रिय--( १ ) मन । ( ८ ) ज्ञानेन्द्रियों की वृत्तियें--( १ ) दर्शन ( देखना ) ( २ ) श्रवण ( सुनना ) ( ३ ) घ्राण ( सूंघना ) ( ४ ) आस्वादन ( चाखना ) ( ५ ) स्पर्श (छूना) ( ९ ) कर्मेन्द्रियों की वृत्तियें ( क्रियाएँ )--( १ ) वचन ( बोलना ) ( २ ) आदान ( लेना ) ( ३ ) विहरण ( चलना ) ( ४ ) उत्सर्ग ( त्यागना ) ( ५ ) आनन्द । ( १० ) अन्तःकरणत्रय की वृत्तियें--( १ ) प्राण ( २ ) अपान ( ३ ) समान ( ४ ) उदान ( ५ ) व्यान, ये शरीर के भीतर रहने वाले पांच वायु हैं । ( ११ ) बुद्धि की वृत्ति--( १ ) अध्यवसाय (निश्चयरूपज्ञान) ( १२ ) अहंकार की वृत्ति--( १ ) अभिमान । ( १३ ) मन की वृत्ति— ( १ ) संकल्प । ( १४ ) तन्मात्र— ( १ ) शब्द ( २ ) स्पर्श ( ३ ) रूपं ( ४ ) रस ( ५ ) गन्ध ।
( ३ ) ( १५ ) भूत ( महाभूत ) — ( १ ) आकाश ( २ ) वायु ( ३ ) तेज ( ४ ) जल ( ५ ) पृथिवी । ( १६ ) अव्यक्त — ( १ ) मूल प्रकृति ( प्रकृति = प्रधान = परमाव्यक्त ) । ( १७ ) व्यक्त — ( १ ) महत्तत्व ( २ ) अहंकार ( ३ ) मन ( ४ ) चक्षुः ( ५ ) श्रोत्र ( ६ ) घ्राण ( ७ ) रसन ( ८ ) त्वक् ( ६ ) वाक् ( १० ) पाणि ( ११ ) पाद ( १२ ) पायु ( १३ ) उपस्थ ( १४ ) शब्द ( १५ ) स्पर्श ( १६ ) रूप ( १७ ) रस ( १८ ) गन्ध ( १९ ) आकाश ( २० ) वायु ( २१ ) तेज ( २२ ) जल ( २३ ) पृथिवी । ( १८ ) प्रमाण — ( १ ) प्रत्यक्ष ( २ ) अनुमान ( ३ ) शब्द । ( १९ ) गुण — ( १ ) सत्व ( २ ) रजः ( ३ ) तमः । ( २० ) गुणों के स्वरूप — ( १ ) सत्व सुखरूप, ( २ ) रज दुःख रूप, ( ३ ) तम मोहरूप । ( २१ ) गुणों के प्रयोजन — ( १ ) सत्व का प्रकाश करना ( २ ) रज का प्रवृत्ति ( ३ ) तम का नियमन करना या रोकना । ( २२ ) केवल-अविकृति — ( १ ) प्रकृति । ( २३ ) केवल-विकृति — ( १ ) मन ( २ ) चक्षु ( ३ ) श्रोत्र ( ४ ) घ्राण ( ५ ) रसन ( ६ ) त्वक् ( ७ ) वाक् ( ८ ) पाणि ( ६ ) पाद ( १० ) पायु ( ११ ) उपस्थ ( १२ ) आकाश ( १३ ) वायु ( १४ ) तेज ( १५ ) जल ( १६ ) पृथिवी ।
( ४ ) [ २४ ] प्रकृति-विकृति- ( १ ) महत्तत्व ( २ ) अहंकार ( ३ ) शब्द ( ४ ) स्पर्श ( ५ ) रूप ( ६ ) रस, ( ७ ) गन्ध । [ २५ ] अप्रकृति-अविकृति- ( १ ) पुरुष । [ २६ ] भाव- ( १ ) धर्म ( २ ) अधर्म ( ३ ) ज्ञान ( ४ ) अज्ञान ( ५ ) वैराग्य ( ६ ) अवैराग्य ( ७ ) ऐश्वर्य्य (८) अनैश्वर्य्य । [ २७ ] बुद्धिका संक्षिप्त सर्ग [ सृष्टि ]-(१) विपर्यय ( २ ) अशक्ति ( ३ ) तुष्टि ( ४ ) सिद्धि । [ २८ ] बुद्धि का विस्तृत सर्ग- ८ विपर्यय, २८ अश- क्तियें, ६ तुष्टियें ८ सिद्धियें ( कुल ५० ) । व्याख्या (क) विपर्यय-(१) अविद्या (तम) (२) अस्मिता (मोह) (३) राग (महामोह) (४) द्वेष (तामिस्र) (५) अभिनिवेश (अन्ध- तामिस्र) । अविद्या या तम आदि के भेद । (अ) अविद्या के भेद-(१) अव्यक्त (२) महत्तत्व (३) अहं- कार (४) शब्द (५) स्पर्श (६) रूप (७) रस (८) गन्धतन्मात्र, इन आठ तत्वों में आत्म बुद्धिरूप अविद्या आठ प्रकार की होती है । (आ) अस्मिता के भेद-(१) अणिमा (२) लघिमा (३) गरिमा (४) महिमा (५) प्राप्ति (६) प्राकाम्य (७) वशित्व (८) ईशित्व । इन सिद्धियों की प्राप्ति से यह अभिमान होना कि-
( ५ )
यह अणिमा आदि हमारा सदाका ऐश्वर्य्य है, तद्रूप अस्मिता ८ प्रकार की होती है। (इ) राग के भेद-[ ५ दिव्य ] ( १ ) शब्द ( २ ) स्पर्श ( ३ ) रूप ( ४ ) रस ( ५ ) गन्ध [ ५ अद्दिव्य ] ( ६ ) शब्द ( ७ ) स्पर्श ( ८ ) रूप ( ६ ) रस ( १० ) गन्ध । (ई) द्वेष के भेद-(१० रागों के द्वेष और आठ सिद्धियों के द्वेष मिल कर १८ द्वेष होते हैं। अर्थात्-दिव्य अदिव्य भेद से १० प्रकार के शब्द आदि विषय परस्पर से उपहत होकर द्वेष के विषय होते हैं या इन पर द्वेष होता है, अतः द्वेष १० प्रकार का होता है, तथा ८ अणिमा आदि सिद्धियें स्वरूप से ही [ अपने आप ही ] कोपनीय होती हैं या इनपर कोप होता है, अतः इनके कारण से द्वेष भी ८ प्रकार का होता है । इस प्रकार द्वेष १८ प्रकार का है। (उ) अभिनिवेश के भेद-अणिमा आदि ८ ऐश्वर्य और शब्द आदि १० विषय, कुल १८ विषयों या उपायों को प्राप्त हो कर देवताओं को भय होता है कि इन्हें असुर न छीन लें, इस प्रकार भय का विषय १८ प्रकार का होने से भय या अभिनिवेश १८ प्रकार का होता है। ( ६ ) (ख) अशक्तिएं-[ ११ इन्द्रियवधजन्य- ] ( १ ) मन्दता (७) (८) (९) (०२ ) अन्धता ( ३ ) वधिरता ( ४ ) अजिघ्रता
( ६ ) ( १० ) ( ११ ) ( १२ ) ( ५ ) जडता ( ६ ) कुष्ठिता ( ७ ) मूकता ( ८ ) ( १३ ) ( १४ ) ( १५ ) कौराय ( ६ ) पंगुता ( १० ) क्लैब्य ( ११ ) ( १६ ) ( १७ ) उदावर्त्त [ १७ बुद्धिवधजन्य ] ( १२ ) प्रकृति- ( १८ ) विपरीता ( १३ ) उपादानविपरीता ( १४ ) ( १९ ) ( २० ) कालविपरीता ( १५ ) भाग्यविपरीता ( १६ ) ( २१ ) ( २२ ) पारविपरीता ( १७ ) सुपारविपरीता ( १८ ) ( २३ ) ( २४ ) पारापारविपरीता ( १६ ) अनुत्तमाम्भोविपरीता ( २५ ) ( २६ ) ( २० ) उत्तमाम्भोविपरीता ( २१ ) अध्ययन- ( २७ ) ( २८ ) विपरीता ( २२ ) शब्दविपरीता ( २३ ) ऊह- ( २९ ) विपरीता ( २४ ) सुहृत्प्राप्तिविपरीता ( २५ ) ( ३० ) ( ३१ ) दानविपरीता ( २६ ) आध्यात्मिकदुःखनाश- ( ३२ ) विपरीता ( २७ ) आधिभौतिकदुःखनाशविपरीता ( ३३ ) ( २८ ) आधिदैविकदुःखनाशविपरीता । ( ३४ ) (ग) तुष्टियें—[ ४ आध्यात्मिकतुष्टियें-] ( १ ) प्रकृति ( ३५ ) ( ३६ ) ( ३७ ) ( २ ) उपादान ( ३ ) काल ( ४ ) भाग्य [.५ ( ३८ बाह्यतुष्टियें ] ( ५ ) अर्जनदोषदर्शनजन्य-
( ७ ) ( ३९ ) विषयोपरमजन्या ( ६ ) रक्षणदोषदर्शनजन्य- ( ४० ) विषयोपरमजन्या ( ७ ) क्षयदोषदर्शनजन्य- ( ४१ ) विषयोपरमजन्या ( ८ ) भोगदोषदर्शनजन्य- ( ४ ) विषयोपरमजन्या ( ६ ) हिंसादोषदर्शन- जन्यविषयोपरमजन्या । ( ४३ ) ( ४४ ) ( ४५ ) (घ) सिद्धियें-( १ ) अध्ययन ( २ ) शब्द ( ३ ) ऊह ( ४६ ) ( ४७ ) ( ४८ ) ( ४ ) सुहृत्प्राप्ति ( ५ ) दान ( ६ ) आध्यात्मिक- ( ४९ ) दुःखनाश ( ७ ) आधिभौतिकदुःखनाश ( ८ ) ( ५० ) आधिदैविक दुःखनाश । ( २९ ) दूसरे प्रकार से विपर्यय-( १ ) अज्ञान । ( ३० ) दूसरे प्रकार से अशक्ति के भेद-(१)अनैश्वर्य्य ( २ ) अवैराग्य ( ३ ) अधर्म । ( ३१ ) दूसरे प्रकार से तुष्टि के भेद-( १ ) धर्म ( २ ) वैराग्य ( ३ ) ऐश्वर्य्य । ( ३२ ) दूसरे प्रकार से सिद्धि-( १ ) ज्ञान । [ ३३ ] तीन दुःख-( १ ) आध्यात्मिक ( २ ) आधिभौ- तिक ( ३ ) आधिदैविक । [ ३४ ] आध्यात्मिकदुःख के भेद- ( १ ) शारीर (शरीर में बात पित्त और कफके घटने तथा बढ़ने
( ८ ) से होने वाला दुःख ) ( २ ) मानस ( मनमें काम क्रोध, लोभ, मोह, भय, ईर्ष्या, विषाद् आदि से होने वाला दुःख ) । [ ३५ ] आधिभौतिकदुःख- मनुष्य, पशु, पक्षी, सर्प आदि से होने वाला दुःख । [ ३६ ] आधिदैविकदुःख-यक्ष, राक्षस, पिशाच आदि से होने वाला दुःख । ( ३७ ) व्यक्त के धर्म- ( १ ) हेतुमत्त्व ( सकारणता ) ( २ ) अनित्यत्व ( ३ ) अव्यापकत्व ( ४ ) क्रिया- वत्त्व ( ५ ) नानात्व ( ६ ) आश्रितत्व ( ७ ) लिङ्गत्व ( ८ ) सावयवत्व ( ६ ) परतन्त्रत्व । [ ३८ ] अव्यक्त के धर्म- ( १ ) कारणशून्यत्व ( २ ) नित्यत्व ( ३ ) व्यापकत्व ( ४ ) अक्रियत्व ( ५ ) एकत्व ( ६ ) अनाश्रितत्व ( ७ ) अलिङ्गत्व (८) निरवयवत्व ( ६ ) स्वतन्त्रत्व । [ ३९ ] व्यक्त अव्यक्त के साझे के धर्म- ( १ ) त्रि- गुणत्व ( २ ) अविवेकित्व ( ३ ) विषयत्व ( ४ ) सामान्यत्व ( ५ ) अचेतनत्व (६) प्रसवधर्मित्व। ( ४० ) पुरुष के धर्म-( १ ) अत्रिगुणत्व ( २ ) विवेकित्व ( ३ ) अविषयत्व ( ४ ) असामान्यत्व (५) चेत- नत्व ( ६ ) अप्रसवधर्मित्व ( ७ ) कारणशून्यत्व ( ८ ) नित्यत्व ( ९ ) व्यापकत्व ( १० ) निष्क्रि- यत्व ( ११ ) अनाश्रितत्व ( १२ ) अलिङ्गत्व ( १३ ) निरवयवत्व ( १४ ) स्वतन्त्रत्व ( १५ ) नानात्व ( १६ ) साक्षित्व ( १७ ) द्रष्टृत्व (१८)
( ६ ) केवलत्व ( १९ ) मध्यस्थ्यत्व ( २० ) अकर्त्तृत्व । .( ४१ ) चार वैराग्य-( १ ) यतमानसंज्ञा ( २ ) व्यति- रेक संज्ञा ( ३ ) एकेन्द्रियसञ्ज्ञा ( ४ ) वशीकार- संज्ञा । ( ४२ ) सूक्ष्म शरीर के १८ तत्व-(१) महत्तत्व (बुद्धि) ( २ ) अहंकार ( ३ ) मन ( ४ ) चक्षुः ( ५ ) श्रोत्र ( ६ ) घ्राण ( ७ ) रसन ( ८ ) त्वक् ( ९ ) वाक् ( १० ) पाणि ( ११ ) पाद् ( १२ ) गुदा ( १३ ) उपस्थ ( १४ ) शब्दतन्मात्र ( १५) स्पर्शतन्मात्र ( १६ ) रूपतन्मात्र ( १७ ) रसतन्मात्र ( १८ ) गन्धतन्मात्र । ( ४३ ) षट्कोष—[तीनमातासे] (१) लोम रोम) (२) लौ- हित ( रक्त ) ( ३ ) मांस [तीन पिता से] ( ४ ) स्नायु ( सूक्ष्मनाड़ी ) ( ५ ) अस्थि ( हाड़ ) ( ६ ) मज्जा ( चर्बी ) । (४४) दैवसर्ग--(देवताओं की उत्पत्ति) ( १ ) ब्राह्म (ब्रह्मका) ( २ ) प्राजापत्य ( प्रजापति का ) ( ३ ) ऐन्द्र ( इन्द्र का ) ( ४ ) पैत्र ( पितरों का ) ( ५ ) गान्धर्व ( गन्धर्वों का ) ( ६ ) याक्ष ( यक्षों का ) ( ७ ) राक्षस ( राक्षसों का ) ( ८ ) पैशाच (पिशा- चों का ) । ( ४५ ) तिर्यग्योनिसर्ग— ( १ ) मनुष्य ( २ ) मृग ( ३ ) पक्षी ( ४ ) सरीसृप( ५ ) स्थावर ( वृक्ष- आदि ) । ( ४६ ) मनुष्य सर्ग- ( १ ) मनुष्य ।
( १० )
( ४७ ) राजवार्तिक ग्रन्थ के ६० पदार्थ-(प्रधानमेंरहने वाले)( १ ) एकत्व( २ ) अर्थवत्व ( ३ ) परार्थता [ पुरुष में रहने वाले ] ( ४ ) अन्यत्व ( ५ ) अक- र्तृत्व ( ६ ) बहुत्व [ उभय गत या प्रधान और पुरुषदोनोंमें रहने वाले ] ( ७ ) अस्तित्व ( ८ ) योग ( ९ ) वियोग [ स्थूल सूक्ष्म में रहने वाले ] (१०) स्थिति ५ विपर्यय, ८ सिद्धियें, ९ तुष्टियें, २८ अशक्तियें ( ६० )। —>--:o:--<—
श्रीः हिन्दी-सांख्य दर्शन विद्याप्रदं गुरुं नत्वा तथा रुद्रं कृपाकरम् । ईश्वरकृष्णसांख्यस्य हिन्दीभाषां करोम्यहम् ॥ सांख्यशास्त्र में प्रवृत्ति का कारण दुःखत्रयाभिघाताज्जिज्ञासा तदपघातकेहेतौ । दृष्टे साऽपार्था चे न्नैकान्तात्यन्ततोऽभावात् ॥१॥ ( क ) क्योंकि — सांख्यशास्त्रीयतत्वों के ज्ञान से तीनों दुःखों की निवृत्ति होती है, अतः उसमें पुरुष की प्रवृत्ति होती है। अथवा तीनों दुःख विनाशी हैं, या उनका विनाश देखा जाता है, अतः उनके नाश के हेतु (सांख्य शास्त्र के तत्वों के ज्ञान) में इच्छा होती है। ( ख ) यदि कहा जावे कि-लौकिक उपाय से तीनों दुःखों का नाश होता है, अतः सांख्य शास्त्र में इच्छा व्यर्थ है? ठीक नहीं, क्योंकि-उस दृष्ट उपाय से ऐकान्तिक तथा आत्यन्तिक दुःख निवृत्ति नहीं होती। अवश्य ही होने वाली दुःखनिवृत्ति एकान्तिक दुःखनिवृत्ति, और जो दुःखनिवृत्ति होकर फिर निवृ- त्त नहीं होती वह आत्यन्तिक दुःखनिवृत्ति कहलाती है। १॥ वैदिक उपाय की अनुपायता । दृष्टवदानुश्रविकः सह्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः । तद्विपरीतः श्रेयान्व्यक्ताव्यक्तज्ञविज्ञानात् ॥२॥ ( क ) आनुश्रविक या वैदिक उपाय भी दृष्ट उपायके स-
हिन्दी सांख्य दर्शन ( २ ) मान है। क्योंकि-वह अविशुद्धि, क्षय और अतिशय दोषों से युक्त है। (ख) श्रेयान् या दुःखध्वंसरूप मोक्ष या वास्तविक क- ल्याण उससे (अविशुद्धि आदि दोष वाले से) विपरीत है। अर्थात् अविशुद्धि आदि दोष से रहित है, सुतराम् वह दोष युक्त उपाय का साध्य नहीं, तथा व्यक्त अव्यक्त और ज्ञ (पुरु- ष) के विज्ञान से होता है ॥ २ ॥ शास्त्र का संक्षिप्त अर्थ । मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयःसप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्नविकृतिःपुरुषः ॥३॥ (क) मूलप्रकृति (प्रधान) अविकृति (अकार्य) है। (ख) महत् आदि ७ पदार्थ (महत्तत्व, अहंकार, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) प्रकृति विकृति या कार्य कारण रूप हैं। (ग) सोलह (१६) पदार्थ (५ ज्ञानेन्द्रियें, ५ कर्मे- न्द्रियें १ मन, ५ महाभूत आकाश आदि) विकाररूप हैं। (घ) पुरुष न प्रकृति (कारण) है, और न विकृति कार्य है ॥ ३ ॥ प्रमाण और उसके भेद (क) प्रमा का साधन प्रमाण होता है। अर्थात्-जिस वस्तु की सहायता से पुरुष को यथार्थ ज्ञान होता है, वह वस्तु प्रमाण कहलाती है। दृष्टमनुमानमाप्तवचनंच, सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं, प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ॥४॥
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ३ ) (क) प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द ये तीन प्रमाणं होते हैं सांख्य लोगों का अभिमान है, कि-और सब उपमान आदि प्रमाणों का इन तीन ही प्रमाणों में अन्तर्भाव हो जाता है। यहां प्रत्यक्षका नाम ‘दृष्ट’, और शब्द प्रमाण का ‘आप्तश्रुति’ नाम लिया गया है । (ख) प्रमाण का निरूपण इस लिये किया गया है कि प्रमेय वस्तु का यथार्थ ज्ञान प्रमाण से होता है यहां ‘प्रमेय’ नाम प्रकृति आदि २५ तत्वों का है । प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के लक्षण प्रतिविषयाध्यवसायो दृष्टं, त्रिविधमनुमानमाख्यातम्। तल्लिङ्गलिङ्गिपूर्वकमाप्तश्रुतिराप्तवचनन्तु ॥५॥ (क) प्रतिविषय नाम अपनें विषय के साथ मिला हुआ इन्द्रिय, उससे उत्पन्न होने वाला (अध्यवसाय) ज्ञान प्रत्य- क्ष ज्ञान होता है। इस ज्ञान का उत्पन्न करने वाला साधन इन्द्रियरूप प्रत्यक्ष प्रमाण कहलाता है । (ख) लिङ्ग (व्याप्य या अल्प देश में रहने वाली वस्तु) और लिङ्गी (व्यापक या अधिक देश में रहने वाली वस्तु) के ज्ञानको अवलम्बन करके अनुमान प्रमाण होता है, अथवा व्याप्ति का ज्ञान अनुमान प्रमाण है। अर्थात्-दो सम्बन्धियों में से एक सम्बन्धी का ज्ञान होना अनुमान प्रमाण है, और उससे दूसरे सम्बन्धी का ज्ञान होना उसका प्रयोजन है । जैसे पीलवान के ज्ञान से हाथी का ज्ञान । यहां पीलवान का ज्ञान अनुमान प्रमाण है, और हाथीका ज्ञान (अनुमिति) उस का प्रयोजन है । ऐसे ही धूम के ज्ञानसे अग्नि के ज्ञान को भी समझना । यह अनुमान प्रमाण तीन प्रकार का है ।
( ४ ) हिन्दी सांख्य दर्शन ( ग ) आप्तश्रुति ( आप्तवाक्य ) या प्रामाणिक पुरुष का वाक्य शब्द प्रमाण होता है ॥ ५ ॥ प्रमाणों का विषय भेद सामान्यतस्तुदृष्टात् अतीन्द्रियाणां प्रतीतिरनुमानात् तस्मादपिचासिद्धं परोक्षमाप्तागमात्सिद्धम् ॥६॥ ( क ) प्रत्यक्ष प्रमाण ( इन्द्रिय ) का विषय घट (घड़ा) पट ( वस्त्र ) एवम् पृथिवी आदि है । ( ख ) अनुमान प्रमाण से अतीन्द्रिय या प्रत्यक्ष के अविषय ( पर्वतादि देशस्थ अग्नि आदि ) पदार्थों की प्रतीति होती है । ( ग ) और उस अनुमान प्रमाण से भी असिद्ध परोक्ष ( महत् तत्व आदि या स्वर्ग अदृष्ट आदि ) पदार्थों की सिद्धि शब्द प्रमाण से होती है ॥६॥ विद्यमान विषय में भी प्रत्यक्ष प्रमाण की अप्रवृत्ति के कारण । अतिदूरात्सामीप्यादिन्द्रियघातान्मनोऽनवस्थानात् सौक्ष्म्याद्व्यवधानादभिभवात्समानाभिहाराच्च ७ अति दूर होने से विद्यमान वस्तु भी प्रतीत नहीं होती जैसे आकाश में उड़ता हुआ पक्षी अति दूर हो जाने पर रहता हुआ भी नहीं दिखाई देता । ( १ ) अत्यन्त समीप होने से भी वस्तु का प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे नेत्र का अञ्जन । ( २ ) इन्द्रिय का घात हो जाने से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे अन्धता ( आंधेपन ) बधिरता ( बहरेपन ) से दर्शन श्रवण नहीं होता ( ३ ) मन के अनवस्थान या अन्य विषय में लग जाने से
हिन्दी सांख्य दर्शन ( ५ ) प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे काम आदि से जिस का मन किसी विषय में लग जाता है और उसे अच्छे प्रकाश में निकट वस्तु भी नहीं दिखाई देती । ( ४ ) अत्यन्त सूक्ष्म होने से भी वस्तु प्रत्यक्ष नहीं होती । जैसे पृथिवी आदि के परमाणु नेत्र के समीप भी रहते हैं, किन्तु वे सूक्ष्मता के कारण दिखाई नहीं देते । ( ५ ) व्यवधान या किसी वस्तु के बीच में आने से वस्तु प्रतीत नहीं होती । जैसे दीवार आदि के बीच में आ जाने से राजा की रानी आदि दिखाई न दे । ( ६ ) अभिभव या तिरस्कार से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे दिन में सूर्य की किरणों से तिरस्कृत होने के कारण ग्रह नक्षत्र नहीं दिखाई देते । ( ७ ) समानाभिहार या समान वस्तु में मिल जाने से प्रत्यक्ष नहीं होता । जैसे जलाशय में मेघ से गिरे हुये जल के विन्दु नहीं दिखाई देते । ( ८ ) इस श्लोक में जो “च” कार दिया है, इस से अनुद्भव ( अप्रकटता ) भी यहां समझना । जैसे दूध आदि की अवस्था में दही आदि को नहीं देखता ।६। प्रधान आदि के प्रत्यक्ष न होने का कारण सौक्ष्म्यात्तदनुपलब्धिर्नाभावात्,कार्यतस्तदुपलब्धेः महदादि तच्चकार्यं प्रकृतिसरूपं विरूपंच ॥ ८ ॥ सूक्ष्मता के कारण प्रधान आदि वस्तुओं का प्रत्यक्ष नहीं होता है, किन्तु उनके अभाव या न होने से नहीं । क्योंकि उनकी उपलब्धि कार्य से होती है, और वह कार्य महत् आदि है, जो प्रकृति के समान रूप और विलक्षण रूपवाला है ॥८॥ सत्कार्यवाद के साधक असदकरणादुपादानग्रहणात् सर्वसंभवाभावात् ।