सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्य दर्शन ( २ ) मान है। क्योंकि-वह अविशुद्धि, क्षय और अतिशय दोषों से युक्त है। (ख) श्रेयान् या दुःखध्वंसरूप मोक्ष या वास्तविक क- ल्याण उससे (अविशुद्धि आदि दोष वाले से) विपरीत है। अर्थात् अविशुद्धि आदि दोष से रहित है, सुतराम् वह दोष युक्त उपाय का साध्य नहीं, तथा व्यक्त अव्यक्त और ज्ञ (पुरु- ष) के विज्ञान से होता है ॥ २ ॥ शास्त्र का संक्षिप्त अर्थ । मूलप्रकृतिरविकृतिर्महदाद्याः प्रकृतिविकृतयःसप्त । षोडशकस्तु विकारो न प्रकृतिर्नविकृतिःपुरुषः ॥३॥ (क) मूलप्रकृति (प्रधान) अविकृति (अकार्य) है। (ख) महत् आदि ७ पदार्थ (महत्तत्व, अहंकार, शब्द स्पर्श, रूप, रस, गन्ध) प्रकृति विकृति या कार्य कारण रूप हैं। (ग) सोलह (१६) पदार्थ (५ ज्ञानेन्द्रियें, ५ कर्मे- न्द्रियें १ मन, ५ महाभूत आकाश आदि) विकाररूप हैं। (घ) पुरुष न प्रकृति (कारण) है, और न विकृति कार्य है ॥ ३ ॥ प्रमाण और उसके भेद (क) प्रमा का साधन प्रमाण होता है। अर्थात्-जिस वस्तु की सहायता से पुरुष को यथार्थ ज्ञान होता है, वह वस्तु प्रमाण कहलाती है। दृष्टमनुमानमाप्तवचनंच, सर्वप्रमाणसिद्धत्वात् । त्रिविधं प्रमाणमिष्टं, प्रमेयसिद्धिः प्रमाणाद्धि ॥४॥