सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context( ४ ) इस काल तत्व के संबन्ध में दो मत हैं । (१) कोई वि- द्वान् मानते हैं कि-यह पुरुष का ही प्रभाव है, जिससे अज्ञा- नी मनुष्य को भय होता है । (२) दूसरा सिद्धान्त मत यह है कि यह भगवान् ही काल रूप से प्रतीत होता है, जिस के सम्बन्ध से गुणों के साम्यरूप प्रधान (जड़) में भी चेष्टा हो जाती है, तथा वही भगवान् शरीरों के भीतर पुरुष रूप से है, और बाहर से वही कालरूप प्रतीत होता है । "प्रभावं पौरुषं प्राहुः कालमेके यतोभयम् । अहंकारविमूढस्य कर्तुः प्रकृतिमीयुषः" ॥ "प्रकृतेर्गुणसाम्यस्य निर्विशेषस्य मानवि ! चेष्टा यतः स भगवान् कालइत्युपलक्षितः ॥" "अन्तःपुरुषरूपेण कालरूपेण यो बहिः । समन्वेत्येष सत्त्वानां भगवानात्ममायया ॥" ( श्री० भा० ३, २६, १८ ) ईश्वरकृष्णीय सांख्य निरीश्वरवादी और भागवतसांख्य ईश्वरवादी है-यही इन दोनों का मतभेद है, कोई कहते हैं पूर्व सांख्य का प्रकृति और पुरुष के विवेक में ही तात्पर्य है, किन्तु ईश्वर के खण्डन में नहीं, इसी से उतने को ही दिखाया है, यह ठीक भी है । क्योंकि-वैदिक पुरुष का निरी- श्वरवादी होना असंभव है । समर्पणम् "येन शुक्लेन महता सर्वं शुक्लीकृतं जगत् । विद्यया मुनये तस्मै कृतिर्मेऽस्तुसमर्पणम् ॥" कार्तिक शुक्ला १५ ⎬ विद्वद्वशंवद- सं० १६७३ वि० ⎭ सीतारामशर्मा